Bhartiya Shikshanshala

B.Ed. sem 4 शिक्षा आयोग (1964-66) की स्थापना

B.Ed. Sem 4- Unit 2 notes

B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है। 
B.Ed. sem 4 शिक्षा आयोग (1964-66) की स्थापना

शिक्षा आयोग (1964-66) का गठन

1948 ई. में “राधाकृष्णन् आयोग” और 1952 ई. में “मुदालियर आयोग” की नियुक्ति के बाद 1964 ई. में एक नये आयोग का गठन किया गया जिसे “राष्ट्रीय शिक्षा आयोग” अथवा “कोठारी आयोग” के नाम से पुकारा जाता है।

आयोग की नियुक्ति के कारण एवं प्रयोजन – 14 जुलाई, 1953 ई. के “प्रस्ताव” में “राष्ट्रीय शिक्षा आयोग” की नियुक्ति के कारणों एवं प्रयोजनों को प्रकाशित किया गया था जो इस प्रकार हैं-

(1) स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने अपने देश की आधारभूत मान्यताओं एवं समाज की नवीन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के विकास की ओर पर्याप्त ध्यान दिया है। इस दिशा में कुछ कार्य भी किया गया है, परन्तु सामान्यतः समय की माँग के अनुसार शिक्षा प्रणाली का विकास नहीं हो सका तथा शिक्षा के अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अब भी “विचार” एवं “कार्य” में महान् अन्तर है।

(2) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति में शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। शिक्षा द्वारा ही लोकतन्त्रीय समाज का निर्माण हो सकता है और वही राष्ट्रीय एकता को सम्भव बना सकती है। शिक्षा ही व्यक्ति को श्रेष्ठता एवं पूर्णता की अनन्त खोज करने की भावना दे सकती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अब यह आवश्यक समझा जाने लगा है कि शिक्षा में सम्पूर्ण क्षेत्र की जाँच की जाय जिसके फलस्वरूप इस तरह की राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली का विकास किया जाय जो राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे।

(3) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही भारत ने राष्ट्रीय विकास के नव-युग में प्रवेश किया। इस युग में भारत का लक्ष्य है न केवल प्रशासन बल्कि जीवन के ढंग में भी धर्म निरपेक्ष लोकतन्त्र की स्थापना, जनता की निर्धनता की समाप्ति, सभी व्यक्तियों के रहन-सहन के स्तर का अध्ययन, कृषि एवं आधुनिकीकरण तथा उद्योगों का शीघ्र विकास, विज्ञान एवं प्राविधिकी का प्रयोग, परम्परागत आध्यात्मिक मूल्यों से उनका समन्वय, धन का उचित वितरण, समाजवादी समाज की स्थापना और सभी व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार तथा सांस्कृतिक प्रगति हेतु अवसरों की समानता। इस सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षा सबसे अधिक प्रभावशाली साधन है परन्तु शिक्षा इन लक्ष्यों की प्राप्ति में उसी समय सहयोग दे सकती है जबकि उसके परम्परागत स्वरूप में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया जाय तथा उसमें आधुनिक विज्ञान प्राविधिकी को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाय।

(4) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही सभी की शिक्षा का बहुत अधिक विस्तार हुआ है परन्तु इस विस्तार के होते हुए भी विभिन्न अंगों के सम्बन्ध में व्यापक असंतोष व्याप्त है। उदाहरण के लिए 14 वर्ष की अवस्था तक के सभी बच्चों के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था नहीं की गयी, जनसाधारण की निर्धनता दूर नहीं की जा सकी, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में विभिन्नीकरण की योजना को पूरा नहीं किया गया और इसके कारण एक ओर जहाँ शिक्षित व्यक्तियों की बेरोजगारी बढ़ी है वहीं दूसरी ओर अनेक उद्योगों एवं व्यवसायों हेतु प्रशिक्षित व्यक्तियों का बहुत अधिक अभाव है। शिक्षकों के वेतनमानों एवं कार्य-दशाओं में वांछित परिवर्तन नहीं किये गये। शिक्षा की अनेक ऐसी समस्यायें हैं जिनके सम्बन्ध में तीव्र विवाद है।

संक्षेप में जिस तेजी के साथ शिक्षा की संख्यात्मक प्रगति हुयी है, उस तेजी के साथ गुणात्मक उन्नति नहीं हुयी है, साथ ही शिक्षा के गुणात्मक उन्नति के लिए निर्धारित नीतियों एवं कार्यक्रमों को संतोषजनक ढंग से क्रियान्वित नहीं किया गया है।

(5) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही भारत सरकार का यह विश्वास रहा है कि शिक्षा-राष्ट्रीय प्रगति तथा कल्याण का आधार है। सरकार का यह भी विश्वास है कि देश एवं जनता का जितना अधिक हित शिक्षा से हो सकता है, उतना अन्य चीजों से नहीं हो सकता है। सरकार ने शिक्षा में विज्ञान तथा प्राविधिकी के सभी साधनों का प्रयोग करने और उन पर अधिक से अधिक धन व्यय करने का निश्चय किया है। किन्तु यह तभी किया जा सकता है जबकि शिक्षा का आधार उत्तम तथा प्रगतिशील हो। सरकार ने शिक्षा को इस आधार पर ही प्रस्तुत करने का संकल्प लिया है।

(6) भारत में राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के विकास के लिए, शिक्षा के सम्पूर्ण क्षेत्र की जाँच की जानी आवश्यक है क्योंकि शिक्षा प्रणाली के समस्त अंग एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया करते हैं और प्रभाव डालते हैं। अच्छे माध्यमिक विद्यालयों के अभाव में प्रगतिशील और अच्छे विद्यालय नहीं हो सकते तथा माध्यमिक शिक्षा के विद्यालय तभी अच्छे हो सकते हैं जबकि प्राथमिक विद्यालय अच्छे हों।

यह आवश्यक है कि शिक्षा के विभिन्न अंगों और स्तरों की अलग-अलग जाँच न करके शिक्षा के सम्पूर्ण क्षेत्र की जाँच की जाय। ‘प्रस्ताव’ के अन्त में कहा गया, “पिछले समय में अनेक आयोगों एवं समितियों ने शिक्षा के सीमित क्षेत्रों, विशिष्ट अंगों का सर्वेक्षण किया है। इसके विपरीत, अब सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली का सूक्ष्म सर्वेक्षण किया जायेगा।”

आयोग का गठन

भारत सरकार ने 14 जुलाई, 1964 ई. को अपने ‘प्रस्ताव’ में नवीन शिक्षा-आयोग की नियुक्ति के कारणों का स्पष्टीकरण किया और उसी प्रस्ताव द्वारा “विश्वविद्यालय अनुदान आयोग” ने प्रो. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में “राष्ट्रीय शिक्षा आयोग’ की नियुक्ति की घोषणा की। आयोग का उद्घाटन 2 अक्टूबर, 1964 ई. को दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ। इस अवसर पर भारत के राष्ट्रपति ने कहा कि, “मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि आयोग शिक्षा के समस्त पहलुओं प्राथमिक, माध्यमिक, विश्वविद्यालय और टेक्निकल की जाँच करके ऐसे सुझाव दे जिससे हमारी शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों पर उन्नति में सहायता प्राप्त हो।” इस आयोग में 14 सदस्य, एक सचिव सदस्य और एक संयुक्त सचिव सदस्य थे। डॉ. डी. एस. कोठारी अध्यक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नई-दिल्ली इसके अध्यक्ष थे।

आयोग की जाँच के विषय14 जुलाई, 1964 ई. के प्रस्ताव में “राष्ट्रीय शिक्षा आयोग” की जाँच के विषयों को इन शब्दों में लेखबद्ध किया गया “आयोग भारत सरकार को शिक्षा के राष्ट्रीय स्वरूप और उनके सब स्तरों एवं पक्षों पर शिक्षा के विकास के लिए सामान्य सिद्धान्तों एवं नीतियों के विषय में परामर्श देगा। आयोग को चिकित्सा अथवा कानून की शिक्षा की समस्याओं की जाँच करने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु वह इन समस्याओं के उन पक्षों की जाँच कर सकता है, जो व्यापक जाँच की दृष्टि से आवश्यक हों।”

Exit mobile version