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B.Ed. sem 4 मुस्लिम काल की शिक्षा में धर्म की भूमिका, उद्देश्य, तथा पाठ्यक्रम

B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes

B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है। 
B.Ed. sem 4 मुस्लिम काल की शिक्षा में धर्म की भूमिका, उद्देश्य, तथा पाठ्यक्रम

मुस्लिम काल में भारतीय शिक्षा का संगठन (Organization of Indian Education in Muslim Period)

मध्य युग में शिक्षा की दो प्रमुख संस्थायें थीं –

(क) मकतब तथा (ख) मदरसे।

मकतबों में प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था थी और मदरसों में उच्च शिक्षा की। प्रायः ये किसी मस्जिद से सम्बन्धित होते थे। इनकी स्थापना साधारणतया मुस्लिम शासकों और धनी व्यक्तियों द्वारा की जाती थी। इन शिक्षा संस्थाओं से केवल मुस्लिम वर्ग ही लाभ उठा पाता था। हिन्दू छात्रों को तो उनमें प्रवेश मिलता ही नहीं था और यदि मिल भी जाता तो वहाँ की धार्मिक कट्टरता और पक्षतापूर्ण वातावरण उसके लिए असहनीय होता था। यहाँ हम मकतब और मदरसों में प्रदान की जाने वाली शिक्षा व्यवस्था का संक्षेप में उल्लेख करेंगे।

(क) मकतब एवं प्राथमिक शिक्षा

(1) मकतब का अर्थ‘मकतब’ शब्द अरबी भाषा के ‘कुतब‘ शब्द से बना है। कुतब का अर्थ होता है ‘उसने लिखा‘। इस प्रकार मकतब का अर्थ हुआ वह स्थान जहाँ लिखना सिखाया जाता है। प्राथमिक स्तर पर बालक लिखना सीखते थे तथा दैनिक धार्मिक कृत्यों में प्रयोग किये जाने वाले कुरान के प्रमुख भागों से परिचित होते थे।

(2) प्रवेश– वैदिककाल में जिस प्रकार बालक ‘उपनयन’ संस्कार के पश्चात् अपनी शिक्षा का प्रारम्भ करता था, उसी प्रकार मकतब में “बिस्मिल्लाह” की रस्म पूरी की जाती थी। बिस्मिल्लाह की रस्म के लिए बालक की आयु 4 वर्ष, 4 मास 4 दिन होनी आवश्यक थी। इस अवसर पर बालक नवीन वस्त्र धारण करता था और उसके सभी नाते रिश्तेदार एकत्रित होते थे। इसके बाद बालक के सामने कुरान की प्रस्तावना तथा उसका 55वाँ तथा 87वाँ अध्याय प्रस्तुत किया जाता था। मौलवी साहब कुरान की आयतों का उच्चारण करते थे और बालक से उसको दुहरवाते थे। यदि बालक पाठ को दुहराने में असमर्थ होता था तो उससे केवल “बिस्मिल्लाह” कहलवाना ही पर्याप्त समझा जाता था। रस्म के पश्चात् बालक की शिक्षा प्रारम्भ हो जाती थी।

(3) पाठ्यक्रम – सर्वप्रथम बालकों को ‘वर्णमाला’ का ज्ञान कराया जाता था। सुलेख के प्रति विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था। वर्णमाला के लिखने पढ़ने के साथ-साथ बालक प्रारम्भिक गणित का भी अध्ययन करते थे। कुरान आयतें रटना आवश्यक माना जाता था। जब छात्रों को लिपि का भली प्रकार ज्ञान हो जाता था तो वह फारसी भाषा और व्याकरण पढ़ते थे। धार्मिकता का विकास करने के लिए बालकों को पैगम्बरों तथा मुस्लिम फकीरों की कहानियाँ तथा फारसी कविताओं का ज्ञान कराया जाता था। नैतिक विकास के लिए इन्हें ‘गुलिस्ताँ’ और ‘बोस्ताँ’ पढ़ाये जाते थे। व्यावहारिक शिक्षा के रूप में छात्रों को वार्तालाप के ढंग, अर्जीनवीसी या पत्र-लेखन का प्रशिक्षण दिया जाता था। शहजादों की शिक्षा का प्रबन्ध घर पर ही किया जाता था। उनको मुख्य रूप से अरबी, फारसी, न्याय तथा सैनिक शिक्षा प्रदान की जाती थी।

(4) शिक्षण-प्रणाली ‘नाजिरा’ – मकतबों में मौखिक-शिक्षण का विशेष रूप से प्रचलन था। ‘कलमा’ और ‘कुरान’ की आयतें बिना समझे छात्रों को रटा दी जाती थीं। इन तख्तियों पर बालक मोटे सरकण्डों से लिखते थे। इसके बाद पतले कलम से कागज पर लिखना सिखाया जाता था। कक्षा में छात्र सामूहिक रूप से उच्चस्वर में एक साथ पहाड़े याद करते थे।

(ख) मदरसा और उच्च शिक्षा

(1) ‘मदरसा का अर्थ’‘मदरसा’ शब्द अरबी भाषा के ‘दरस’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है भाषण देना-इस प्रकार मदरसा शब्द का अर्थ हुआ वह स्थान जहाँ भाषण दिये जाते थे। मकतब की शिक्षा समाप्त करने के बाद छात्र मदरसे में प्रवेश लेते थे। मदरसों में चूँकि उच्च शिक्षा प्रदान की जाती थी। अतः वहाँ की मुख्य शिक्षण पद्धति व्याख्यानों पर आधारित थी। बड़े-बड़े मदरसों के साथ पुस्तकालय संलग्न रहते थे। मदरसों का शिक्षा-काल 10 से 12 वर्ष का था।

(2) पाठ्यक्रम – मदरसों का पाठ्यक्रम दो भागों में विभाजित था-

(क) धार्मिक पाठ्यक्रम – इसके अंतर्गत कुरान का अध्ययन, इस्लामी-ग्रन्थ, इस्लामी इतिहास, इस्लामी कानून, मुहम्मद साहब की परम्परा तथा सूफी सिद्धान्तों का अध्ययन शामिल था। कट्टर मुस्लिम शासक सूफी सिद्धान्तों का अध्ययन करना पसंद नहीं करते थे, अतः उनके काल में इसका निषेध कर दिया जाता था।

(ख) लौकिक या सांसारिक पाठ्यक्रम – लौकिक पाठ्यक्रम के अन्तर्गत अरबी, फारसी, व्याकरण, साहित्य, गणित, विज्ञान, भूगोल, तर्कशास्त्र, ज्योतिष, यूनानी, चिकित्सा, कृषि, कानून आदि आते थे। एस० एन० मुखर्जी के अनुसार, “यह आवश्यक नहीं था कि प्रत्येक मदरसा सब विषय पढ़ावे। कुछ में थी, जैसे लाहौर और स्यालकोट (गणित और ज्योतिष), रामपुर (तर्क एवं ज्योतिष), दिल्ली (कविता और संगीत) तथा लखनऊ (शिया शिक्षा)।” अकबर से पूर्व मदरसों में इस्लामी शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाता था, वह प्रथम सम्राट था जिसने पाठ्यक्रम में जीवनोपयोगी विषयों को सम्मिलित करने के साथ-साथ हिन्दू-दर्शन तथा साहित्य के अध्ययन की भी व्यवस्था की थी।

(3) शिक्षण विधि– मकतबों के समान ही मदरसों में भी मौखिक शिक्षण का अत्यधिक प्रचलन था। अधिकांश शिक्षण कार्य व्याख्यान या भाषण-विधि के द्वारा सम्पन्न होता था। हस्त-शिल्प, चिकित्सा तथा संगीत आदि विषयों के शिक्षण के लिए प्रायोगिक शिक्षा की व्यवस्था थी। धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र और राजनीति शास्त्र का शिक्षण तर्क-विधि के द्वारा होता था। अध्यापक छात्रों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित करते थे और उनकी व्यक्तिगत कठिनाइयों को हर प्रकार से हल करने को तत्पर रहते थे।

आधुनिक शिक्षा हेतु ग्रहणीय तत्त्व और विशेषताएँ (Acceptable Elements or Features for Modern Education)

यह ठीक है कि मुस्लिम शिक्षा के कतिपय दोष थे परन्तु इस शिक्षा में अनेक ऐसे उपयोगी तत्त्व मिलते हैं जो आधुनिक युग में भी ग्रहणीय हैं। वर्तमान में निम्नलिखित विशेषताएँ उपयोगी हो सकती है-

(1) व्यावहारिक शिक्षा – आधुनिक वैज्ञानिक युग में शिक्षा को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष प्राप्त करने का साधन कहना अनुचित प्रतीत होता है। अतएव यह आवश्यक है कि जिस तरह मुस्लिम शिक्षा में व्यावहारिक विषयों को महत्त्व प्रदान किया गया था उसी तरह भारत की आधुनिक शिक्षा में भी व्यावहारिक विषयों को महत्त्व दिया जाय। व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करके ही छात्र समाज के उपयोगी नागरिक बन सकते हैं तथा अपनी जीविका आसानी से उपार्जन कर सकते हैं।

(2) निःशुल्क शिक्षा – उस समय प्राथमिक और उच्च दोनों ही स्तरों पर मुस्लिम शिक्षा निःशुल्क थी। आधुनिक भारतीय शिक्षा प्राथमिक स्तर पर तो पूरी तरह निःशुल्क है। कहीं-कहीं माध्यमिक स्तर भी निःशुल्क है परन्तु अन्य स्थानों पर माध्यमिक शिक्षा के लिए शुल्क देना होता है। उच्च स्तर पर तो निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था है ही नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी स्तरों पर निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाय। ऐसा इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक शिक्षा इतनी महंगी हो गयी है कि अनेक छात्र शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। निर्धन परिवारों के बच्चों के लिए यह बात विशेष रूप से सत्य है। शिक्षा को पूरी तरह से निःशुल्क बना देने से सरकार पर व्यय तो बढ़ेगा परन्तु इससे जनता का बहुत हित होगा। देश के वे प्रखर बुद्धि वाले एवं प्रतिभाशाली छात्र, जो शिक्षा प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं विशेष रूप से लाभान्वित होंगे और इससे समाज और राष्ट्र का हित होगा।

(3) व्यक्तिगत सम्पर्क – मुस्लिम युग में छात्र और शिक्षक के बीच में व्यक्तिगत सम्पर्क था। अधिकतर मदरसों में शिक्षक और छात्र साथ-साथ रहते थे। जिसका परिणाम यह होता था कि उनमें व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित हो जाता था और इस सम्पर्क के माध्यम से शिक्षक छात्रों में विशिष्ट गुणों का समावेश करता था। आधुनिक भारतीय शिक्षा का एक बहुत बड़ा दोष यह है कि इसमें व्यक्तिगत शिक्षा की अवहेलना की गयी है। यही कारण है कि छात्रों में अनुशासनहीनता और उच्छृंखलता बढ़ती जा रही है। इसे समाप्त करने और छात्रों के चरित्र का सम्यक् विकास करते हुए उन्हें शिक्षक के निकट एवं व्यक्तिगत सम्पर्क में लाना परम आवश्यक है। फलस्वरूप मुस्लिम शिक्षा में पाये जाने वाले शिक्षकों एवं छात्रों के व्यक्तिगत सम्पर्क को आधुनिक शिक्षा में अपनाया जाना चाहिए।

(4) शिक्षक की स्थिति में उन्नति – मुस्लिम युग में एकाध अपवाद को छोड़कर अधिकतर शिक्षकों को छात्रों की भक्ति, समाज का सम्मान और राज्य का संरक्षण प्राप्त था। आधुनिक भारतीय शिक्षा में यह स्थिति देखने को नहीं मिलती है। इस समय शिक्षकों की स्थिति निम्न से निम्नतर होती जा रही है। इसके आंशिक रूप में शिक्षक किन्तु मुख्य रूप में समाज और राज्य उत्तरदायी है। शिक्षक का न तो समाज में सम्मान है और न उसे राज्य का संरक्षण प्राप्त है। मुस्लिम शिक्षा के तत्त्वों को स्वीकार करके, आवश्यक है कि समाज और राज्य दोनों ही उसके प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करें और उसकी स्थिति को समुन्नत बनाने का प्रयत्न करें।

(5) धार्मिक और लौकिक शिक्षा का समन्वय – आधुनिक भौतिकवादी युग में लौकिक शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है परन्तु इस तथ्य को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि धर्म व्यक्ति के जीवन और चरित्र का प्रमुख आधार स्तम्भ है। आधुनिक भारतीय शिक्षा की परिधि में धर्म को हटाकर इस आधार स्तम्भ को हटा दिया गया है। इसका दुष्परिणाम सर्वत्र देखने को मिल रहा है। धर्महीन शिक्षा के फलस्वरूप छात्रों में अकारण झूठ बोलने, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को धोखा देने, निजी हित के लिए लूट-मार करने और कामवासनाओं की तृप्ति के लिए अबलाओं का अपहरण करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और हमारी प्रवृत्ति बर्बर होती जा रही है। इस प्रवृत्ति में सुधार तभी हो सकता है जब मुस्लिम शिक्षा का अनुकरण करके आधुनिक भारतीय शिक्षा में धार्मिक और लौकिक शिक्षा का समन्वय स्थापित किया जाय।

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