
नई शिक्षा नीति और शिक्षा के विभिन्न पहलू (Different Aspects of Education and New Education Policy)
‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत शिक्षा के विभिन्न पहलूओं पर विचार किया गया और उनमें सुधार लाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। यहाँ इनका उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा है-
(1) प्राथमिक शिक्षा– ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत संविधान के इस संकल्प को दोहराया गया कि शिक्षा सभी को सुलभ हो। सभी बालक-बालिकाओं को गुणात्मक दृष्टि से अपेक्षित निम्नतम स्तर की शिक्षा अवश्य प्राप्त होनी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि अपव्यय और अवरोधन को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाये जायेंगे। प्राथमिक विद्यालयों को उन्नत बनाने के लिए’आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ (Operation Black Board) योजना अपनायी जायेगी और ‘बाल-केन्द्रित’ शिक्षण पर बल दिया जायेगा तथा उपचारात्मक शिक्षा की व्यवस्था की जायेगी।
(2) माध्यमिक शिक्षा– ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) में माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में कहा गया कि माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को विज्ञान, मानविकी, और सामाजिक विज्ञानों का ज्ञान कराया जाय। प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालयों की स्थापना की जाय और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के द्वारा शैक्षिक मानकों में समानता लायी जाय। माध्यमिक शिक्षा पर परीक्षा में होने वाले संयोग, व्यक्तिनिष्ठता, रटाई आदि पर से ध्यान हटाकर सतत् एवं सम्पूर्ण मूल्यांकन प्रणाली अपनाई जाय। निष्पक्षतापूर्वक योग्य और प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति की जाय और माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण किया जाय।
(3) उच्च शिक्षा– ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) में यह कहा गया कि उच्च शिक्षा उन्हें भी प्रदान की जाय जो इसके योग्य हैं। नौकरी को डिग्री से अलग कर दिया जाय। स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रशिक्षण के आधार पर ही योग्य छात्रों को प्रवेश दिया जाय। अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए स्नातक स्तर पर कोचिंग की व्यवस्था की जाय। उच्च शिक्षा की गुणात्मकता की वृद्धि के लिए अन्तर-अनुशासनात्मक उपागम को अपनाया जायेगा। अध्यापकों की कार्यक्षमता का मूल्यांकन उनके कृत-कार्यों एवं दायित्व के बोध के आधार पर किया जायेगा। शोध को महत्व दिया जायेगा और तकनीकी में मेधा को पहचान कर उसका संवर्धन किया जायेगा।
‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) में यह कहा गया कि ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ विश्वविद्यालयों से राजनीतिक दलबन्दी, क्षेत्रवाद दूर करें। इस शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा में शिक्षकों की कार्यक्षमता एवं योग्यता बढ़ाने के लिए एकेडेमिक कालेजों की स्थापना की बात भी कही गयी। ‘नवीन शिक्षा-नीति’ में यह भी कहा गया कि उच्चस्तरीय महाविद्यालयों को स्थायी संस्था बनाने का भी प्रयास किया जायेगा। इस शिक्षा नीति में यह स्पष्ट किया गया है कि सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण का दायित्व ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद’ के सुपुर्द किया जाय। सेवारत अध्यापकों- के लिए संवर्धन कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाय। व्याख्यान, गोष्ठी, कार्यशाला, सामूहिक चर्चा, परिभ्रमण, प्रयोगशाला, निरीक्षण, सूक्ष्म शिक्षण, साहित्य एवं पुस्तकालय आदि के माध्यम से नव-नियुक्त अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाय। उच्च शिक्षा-संस्थाओं में मालिक और नौकर के सम्बन्धों को बराबर की भागीदारी में बदला जाय। विश्वविद्यालयों की प्रबन्ध-परक व्यवस्था में परिवर्तन किया जाय तथा सभी समितियों और कुलपति में निकट सम्बन्ध हों।
(4) महिला शिक्षा – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत यह कहा गया कि महिलाओं के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए महिला शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाय। विभिन्न स्तरों पर तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर बल दिया गया। पाठ्यक्रम एवं पाठ्य-पुस्तकों में जो लिंग भेद दिखलाई देता है उसे दूर किया जायेगा।
(5) प्रौढ़-शिक्षा – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत 15 से 35 आयु वर्ग के प्रौढ़ों के साक्षरता कार्यक्रम के साथ सतत् शिक्षा का व्यापक कार्यक्रम निर्धारित किया गया। इसके अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र में सतत शिक्षा केन्द्रों की स्थापना, नियोक्ताओं और श्रमिकों की शिक्षा, पुस्तकों एवं वाचनालयों का विस्तार, रेडियो, टेलीविजन और फिल्मों के माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण-कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा।
(6) पिछड़े वर्गों की शिक्षा – ‘नवीन शिक्षा नीति’ के अन्तर्गत पिछड़े वर्ग की शिक्षा पर बल दिया गया। भारत की विशाल जनसंख्या में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो गरीबी और अन्धविश्वास के फलस्वरूप पिछड़ा हुआ हैं। ‘नवीन शिक्षा-नीति’ में उनके लिए कई योजनाओं के द्वारा विभिन्न प्रकार की शैक्षिक सुविधायें उपलब्ध किए जाने की व्यवस्था है। उनके लिए छात्रावास और आश्रमों की योजना के साथ ही निःशुल्क भोजन, वस्त्र, शिक्षण सामग्री और छात्रवृत्तियों की सुविधायें प्रदान करने की बात कही गयी है। ‘नवीन राष्ट्रीय शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए एक निश्चित स्तर तक शिक्षा की व्यवस्था की है अतएव अंध, मूक, बधिर तथा दिव्यांग बच्चे भी इस उपलब्धि के अन्तर्गत आ जाते हैं।
(7) तकनीकी शिक्षा – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत यह बात कही गयी कि तकनीकी शिक्षा के प्रशिक्षण में मशीनों एवं साधनों की अनुपलब्धता है। तकनीकी शिक्षण-संस्थाओं में अध्यापक नहीं आते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में उनके लाभ की दृष्टि से तकनीकी संस्था उत्साहपूर्वक कार्य नहीं कर रही है और आई. आई. टी. आदि संस्थाओं से निकले हुए छात्र रोजगार हेतु विदेश चले जाते हैं। ‘नवीन राष्ट्रीय शिक्षा-नीति’ में इन समस्याओं के निदान का प्रयास करने की बात कही गयी है।
(8) शिक्षक और शिक्षक शिक्षा – शिक्षक-शिक्षा का पाठ्यक्रम आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। चयन-विधि, संख्या और गुणवत्ता की दृष्टि से भी असंगतियाँ पायी जाती हैं। यह शिक्षा नौकरी की ओर झुकी हुयी है। शिक्षक अध्ययन और अध्यापन से उदासीन हैं। शिक्षकों का चयन पूरी तरह से योग्यता के आधार पर नहीं होता। प्रशिक्षण भी असंगठित एवं योजनाहीन है। शिक्षक संगठन राजनीति में सक्रिय है। पदोन्नतियाँ सेवा अवधि के आधार पर होती हैं, योग्यता के आधार पर नहीं।
(9) प्रबन्ध शिक्षा – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ में यह बात कही गयी कि कृषि, ग्राम्य-विकास, स्वास्थ्य, समाज कल्याण आदि के लिए प्रबन्ध-शिक्षा और उसमें शोध-प्रलेखन एवं क्रियात्मक अनुसंधान की आवश्यकता है। प्रबन्ध शिक्षा में सुधार के लिए प्रबन्ध संस्थाओं, विश्वविद्यालयों के प्रशासन विभागों और सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तिगत और सार्वजनिक संस्थाओं के लोगों में सम्पर्क होना चाहिए।