Bhartiya Shikshanshala

B.Ed. sem 4 राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 पर चर्चा

B.Ed. sem 4 राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 पर चर्चा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1968 [National Education Policy (NPE-1968)] पर चर्चा

भारत सरकार ने सन् 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति  को घोषित किया था जिसमें 17 आधारभूत सिद्धान्तों को स्थापित किया गया है और यह कहा गया है कि भारत सरकार इन सिद्धान्तों के अनुरूप ही देश में शिक्षा का विकास करेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में शिक्षा के ऊपर किये जाने वाले व्यय को बढ़ाकर यथाशीघ्र राष्ट्रीय आय के छह प्रतिशत के बराबर लाने का भी प्रस्ताव किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सम्मिलित सिद्धान्तों का वर्णन संक्षेप में निम्नवत् हैं- 

(1) निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षासंविधान की धारा-45 के अनुरूप 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए श्रमपूर्वक प्रयत्न किया जाना चाहिए। 
 
(2) अध्यापकों का स्तर, वेतन तथा शिक्षा – जहाँ तक सम्भव हो विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को अधिक सहायता देने की आवश्यकता है। 
 

अंशकालीन शिक्षा तथा पत्राचार पाठ्यक्रम 

  • विश्वविद्यालय स्तर पर अंशकालीन शिक्षा तथा पत्राचार पाठ्यक्रमों का बड़े पैमाने पर विकास किया जाना चाहिए। यह सुविधा माध्यमिक छात्रों, अध्यापकों तथा कृषि, औद्योगिक व अन्य कमियों के लिए भी विकसित की जानी चाहिए। अंशकालीन तथा पत्राचार पाठ्यक्रमों के द्वारा दी गई शिक्षा की पूर्ण कालीन शिक्षा के समकक्ष स्तर दिया जाना चाहिए। 

साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार 

  • (i) राष्ट्रीय विकास की गति को तेज करने के लिए लोक निरक्षरता को समाप्त करना आवश्यक है। बड़े-बड़े व्यावसायिक, औद्योगिक तथा अन्य संस्थाओं के कर्मचारियों को जल्द से जल्द कार्यवाहक साक्षर बनाया जाना चाहिए। अध्यापकों तथा छात्रों को साक्षरता अभियान आयोजित करने में, विशेष रूप से सामाजिक व राष्ट्रीय सेवा कार्यक्रमों के अंग के रूप में, सक्रिय ढंग से भाग लेना चाहिए। 
  • (ii) नवयुवक किसानों की शिक्षा तथा स्वरोजगार के लिए युवा वर्ग के प्रशिक्षण पर विशेष बल देना चाहिए। 

खेल-कूद 

  • आम छात्रों तथा साथ-ही-साथ खेल कूद में प्रवीण छात्रों की शारीरिक योग्यता व खेल कुशलता में वृद्धि के उद्देश्य के लिए खेलकूद का विकास बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए। जहाँ पर क्रीड़ा प्रांगण तथा अन्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं वहाँ पर ये सुविधाएँ वरीयता आधार पर प्रदान की जानी चाहिए। 

अल्पसंख्यकों की शिक्षा 

  • अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बनाये रखने एवं उनकी शैक्षिक अभिरूचि को बढ़ाने के लिए यथा सम्भव शैक्षिक प्रयत्न किये जाने चाहिए। 

शैक्षिक ढाँचा 

  • राष्ट्र के प्रत्येक भाग में शैक्षिक ढाँचे का मोटे तौर पर एक समान होना आवश्यक है। इसके लिए 10+2+3 के ढाँचे को अपनाना चाहिए, जिसमें दो वर्ष का उच्च माध्यमिक स्तर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्कूलों में अथवा कॉलेजों में अथवा दोनों में हो सकता है। 
 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 1968 की घोषणा होने पर इसके सम्बन्ध में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हुई। कुछ ने इसका स्वागत किया जबकि कुछ ने इसकी आलोचना की। वस्तुतः सन् 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा भारतीय शिक्षा के इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है जिसने राष्ट्र की लक्ष्यविहीन शिक्षा प्रणाली को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करने का प्रयास किया। एक लम्बी अवधि तक राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था का विकास इस शिक्षा नीति के अनुरूप होता रहा। 
 
(1) शिक्षा की गुणवत्ता तथा राष्ट्रीय विकास में योगदान करने वाले कारकों में अध्यापक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके व्यक्तिगत चरित्र व गुणों, शैक्षिक योग्यताओं तथा उत्तरदायित्वों को देखते हुए पर्याप्त तथा संतोषजनक होने चाहिए। 
 
(2) अध्यापकों को स्वतन्त्र अध्ययन करने, अनुसंधान सम्बन्धी निबन्ध प्रकाशित करने तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर लिखने या भाषण देने की शैक्षिक स्वतन्त्रता की रक्षा की जानी चाहिए। 
 
(3) अध्यापक शिक्षा विशेषकर अन्तःसेवा अध्यापक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। 

भाषाओं का विकास 

  1. क्षेत्रीय भाषायें– शैक्षिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिए एक आवश्यक कदम भारतीय भाषाओं तथा साहित्य का उत्साह के साथ विकास करना है। 
  2. त्रिभाषा सूत्र– राज्य सरकारों को माध्यमिक स्तर पर त्रिभाषा सूत्र अपनाना व लागू करना चाहिए। त्रिभाषा सूत्र में, हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी व अंग्रेजी के अलावा किसी एक आधुनिक भारतीय भाषा जिसमें किसी दक्षिण भाषा को वरीयता दी जाये तथा अहिन्दी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी के साथ हिन्दी को रखना चाहिए। विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में हिन्दी व अंग्रेजी के उपयुक्त पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे छात्र विश्वविद्यालय मानकों के अनुरूप इन भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त कर लें। 
  3. हिन्दी– हिन्दी के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए यथासम्भव प्रयास किये जाने चाहिए। हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि यह संविधान की धारा- 351 के प्राविधान के अनुरूप भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति के सभी अंगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके। 
  4. संस्कृत – भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत के विशेष महत्त्व तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता में उसके योगदान को दृष्टिगत रखते हुए स्कूल तथा विश्वविद्यालय स्तर पर सांस्कृतिक शिक्षण की सुविधाएँ उदारतापूर्वक प्रदान की जानी चाहिए। 
  5. अन्तर्राष्ट्रीय भाषाएँ– मातृ भाषाओं के अलावा अंग्रेजी तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय भाषाओं के अध्ययन पर भी विशेष बल दिया जाना चाहिए। 
 

शिक्षा के अवसरों का समान रूप से मिलना 

  1. शैक्षिक सुविधाओं के क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त किया जाना चाहिए तथा ग्रामीण व अन्य पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा की अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए। 
  2. सामाज में समानता तथा राष्ट्र की एकता को बढ़ाने के लिए समान स्कूल पद्धति (Common School System) को अपनाया जाना चाहिए। सामान्य स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारा जाना चाहिए। पब्लिक स्कूलों में छात्रों को प्रवेश योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिए तथा सामाजिक स्तर के केन्द्रीकरण को रोकने के लिए आनुपातिक आधार पर कुछ छात्रों को शुल्क मुक्ति दी जानी चाहिए। 
  3. लड़कियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। 
  4. पिछड़े वर्गों तथा विशेष रूप से दिव्यांग बालकों के लिये शैक्षिक सुविधाओं का विकास करना चाहिए। 
  5. शारीरिक तथा मानसिक रूप से दिव्यांग बालकों के लिये शैक्षिक सुविधाओं का विकास करना चाहिए। 

प्रतिभा की खोज करना 

  • प्रवीणता का विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रतिभाएँ हैं, उनको छोटी उम्र में ही खोज निकाला जाये तथा उनके विकास के हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए। 

कार्यानुभव तथा राष्ट्रीय सेवा 

  • परस्पर सेवा तथा सहयोग के उपयुक्त कार्यक्रमों के द्वारा स्कूल तथा समुदाय को एक-दूसरे के निकट लाया जाना चाहिए। अतः सामुदायिक सेवा तथा राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के सार्थक व चुनौतीपूर्ण कार्यक्रमों के भाग सहित कार्यानुभव तथा राष्ट्रीय सेवा, शिक्षा के अभिन्न अंग होने चाहिए। इन कार्यक्रमों में स्वावलम्बन, चरित्र निर्माण व सामाजिक संकल्प की भावना के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। 

विज्ञान शिक्षा तथा अनुसंधान 

  • राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास की गति को बढ़ाने के लिए विज्ञान की शिक्षा तथा अनुसंधान को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्कूल व्यवस्था के अन्त तक विज्ञान व गणित सामान्य शिक्षा के अभिन्न अंग होने चाहिए।

कृषि तथा उद्योगों के लिए शिक्षा 

कृषि तथा उद्योगों की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए- 
  1. प्रत्येक राज्य में कम-से-कम एक कृषि विश्वविद्यालय होना चाहिए। अन्य विश्वविद्यालयों में भी यदि आवश्यक हों तो कृषि के किसी एक या अधिक पक्षों के अध्ययन के लिए सशक्त विभाग खोले जाने चाहिए।
  2. तकनीकी शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में उद्योगों से सम्बन्धित व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
  3. राष्ट्र की कृषि, औद्योगिक तथा अन्य तकनीकी जनशक्ति की आवश्यकता की निरन्तर समीक्षा होनी रहनी चाहिए तथा शिक्षा संस्थाओं से निकले छात्रों व रोजगार के अवसरों के बीच संतुलन बनाये रखने के निरन्तर प्रयत्न किये जाने चाहिए। 

पुस्तकों का उत्पादन 

  • प्रोत्साहन तथा पारिश्रमिक की उदार नीति के द्वारा श्रेष्ठतम लेखकों को आकर्षित करके पुस्तकों की गुणवत्ता में सुधार किया जाना चाहिए। पुस्तकों का मूल्य इतना कम होना चाहिए कि साधारण हैसियत का छात्र भी उन्हें खरीद सकें।
  • व्यावसायिक कदमों पर स्वायत्त पुस्तक निगम की स्थापना की सम्भावना पर विचार किया जाना चाहिए तथा कुछ ऐसा मूल पाठ्य-पुस्तकों के लिए प्रयास किये जाने चाहिए जो सम्पूर्ण राष्ट्र में चलें। 

परीक्षायें 

  • परीक्षा सुधार का एक प्रमुख ध्येय परीक्षओं की विश्वसनीयता व वैधता में सुधार करना तथा मूल्यांकन की एक ऐसी सतत् प्रक्रिया बनाना होना चाहिए जिससे छात्रों को अपने उपलब्धि स्तर को उन्नत करने में सहायता मिले न कि किसी समय विशेष पर छात्रों के कार्य की गुणवत्ता देखकर उसे प्रमाणित किया जाये। 

माध्यमिक शिक्षा

  1. माध्यमिक शिक्षा सामाजिक परिवर्तन तथा रूपान्तरण का एक प्रमुख साधन है। अतः माध्यमिक शिक्षा की सुविधाएँ तेजी से उन क्षेत्रों तथा वर्गों को भी दी जानी चाहिए। जिनको अभी तक ये सुविधायें प्राप्त नहीं हैं।
  2. माध्यमिक स्तर पर तकनीकों तथा व्यावसायिक शिक्षा की सुविधाओं को भी बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। माध्यमिक तथा व्यावसायिक शिक्षा की सुविधाओं का प्रावधान मोटे तौर पर विकासशील अर्थव्यवस्था तथा रोजगार के वास्तविक अवसरों के अनुरूप होना चाहिए। तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा की सुविधाओं विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग, चिकित्सा व जनस्वास्थ्य, गृह प्रबन्ध, कला व शिल्प, सचिव प्रशिक्षण आदि में भी दी जानी चाहिए। 

विश्वविद्यालयी शिक्षा 

  1. किन्हीं महाविद्यालयों, पुस्तकालयों व अन्य सुविधाओं तथा कर्मचारियों की संख्या को देखते हुए निश्चित की जान चाहिए।
  2. नये विश्वविद्यालय की स्थापना में पर्याप्त सावधानी की आवश्यकता है। आवश्यक धन उपलब्ध होने तथा शिक्षा मानकों को बनाये रखने में पर्याप्त व्यवस्था होने पर ही नये विश्वविद्यालय खोले जाने चाहिए।
  3. स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के संगठन तथा इस स्तर पर प्रशिक्षण व अनुसंधान पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।
  4. उच्च अध्ययन केन्द्रों को सशक्त बनाया जाना चाहिए तथा अनुसंधान व प्रशिक्षण के उच्चतम सम्भव स्तर के लिए केन्द्रों के कुछ समूह स्थापित किये जाने चाहिए।
 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1968 के इन सिद्धांतों को अपनाकर हम शिक्षा प्रणाली में सुधार कर सकते हैं और छात्रों के भविष्य को उज्जवल बना कर देश की प्रगति में योगदान दे सकते हैं। 
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