B.Ed. Sem 4- Unit 2 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा सबसे पहले 1986 ई. में की गयी परन्तु उसमें सफलता प्राप्त नहीं हुई। 1986 ई. में देश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक नई शिक्षा नीति की घोषणा की गयी। इस नई शिक्षा नीति के निर्धारण में समसामयिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन किया गया जो शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही थीं। देश के युवा वर्ग में आत्म-विश्वास का अभाव है, प्राचीन मान्यताएँ खण्डित हो रही हैं, जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है, जीवन में नये तनाव उत्पन्न हो रहे हैं, धर्म-निरपेक्षता, समाजवाद, लोकतन्त्र, व्यवसाय, आचार सब पतन के गर्त में जा रहे हैं। गाँवों और शहरों के मध्य असन्तुलन बढ़ता जा रहा है, आदि बातें नई शिक्षा नीति के लिए चुनौती थीं। नई शिक्षा नीति में यह कहा गया कि उपर्युक्त दृष्टिकोण एवं परिस्थितियों में शिक्षा की उपादेय नीति ही पथ-प्रदर्शक बन सकती है और देश के नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रवृत्तियों, राष्ट्रीय सम्बद्धता आदि की भावना में वृद्धि कर सकती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 [National Education Policys (NPE-1986)] की प्रमुख विशेषताएँ
ऊपर हमने जिन दोषों का उल्लेख किया है उन दोषों को दूर करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा-नीति के अन्तर्गत विविध उपाय बतलाये गए हैं और यही इसकी मूलभूत विशेषताएँ हैं। यहाँ उनका उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा हैः
(1) राष्ट्रव्यापी संरचना – 1986 ई. की नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत समस्त देश के लिए एक-समान शैक्षिक ढाँचें की व्यवस्था की गयी है जिसे 10+2+3 का ढाँचा कहा जाता है। इसमें पहले 10 वर्ष की शिक्षा सभी बाल-बालिकाओं हेतु समान रूप में है। इसे विभिन्न स्तरों में इस तरह विभाजित किया गया है- 5 वर्ष का प्राथमिक स्तर, 3 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर, 2 वर्ष का माध्यमिक स्तर। इसके बाद +2 के उच्चतर माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के व्यवसायीकरण की योजना निर्मित की गयी है तथा इसके बाद 3 वर्ष की महाविद्यालयी शिक्षा की व्यवस्था की गयी है।
(2) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम – नई शिक्षा नीति में यह कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था सम्पूर्ण देश के लिए एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पर आधारित होगी, जिसमें एक बीच-पाठ्यक्रम (Common Core) के साथ अन्य सभी तथ्य भी होंगे जो लचीले होंगे।
(3) शिक्षा की समानता – शिक्षा में समानता का तात्पर्य है सभी को बिना किसी जाति, धर्म, वर्ग अथवा लिंग भेद के समान रूप से शिक्षा के अवसर प्रदान करना। नवीन शिक्षा-नीति के अन्तर्गत इस तथ्य पर बल दिया गया कि शिक्षा में व्याप्त विषमताओं और विसंगतियों को दूर किया जाय और एक निश्चित स्तर तक सभी को शिक्षा सुलभ करायी जाय। अधिकाधिक शिक्षण संस्थायें खोली जायें और सभी को लेखन-पठन सामग्री सुलभ करायी जाय।
(4) अनौपचारिक शिक्षा– ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत अनौचारिक शिक्षा पर अधिक बल दिया गया। 1 से 14 वर्ष की आयु के इस तरह के बच्चे जिन्होंने बीच में ही विद्यालय छोड़ दिया अथवा किसी काम में लग गए हैं, अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों के माध्यम से शिक्षित हो सकेंगे। ‘नई शिक्षा नीति’ के अन्तर्गत उदारपूर्वक अनुदान देकर इन केन्द्रों को विकसित करने की योजना बनायी गयी।
(5) रोजगारपरक शिक्षा – नवीन राष्ट्रीय शिक्षा-नीति’ +2 स्तर पर कक्षा और 11 और 12 में कक्षा के व्यवसायीकरण की व्यवस्था की गयी। यह संकल्प लिया गया कि 1990 ई. तक 10 प्रतिशत और 1995 ई. तक 20 प्रतिशत छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाय।
(6) प्रभावकारी शैक्षिक व्यवस्था – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत शिक्षा की व्यवस्था क्रियाशील बनाने के लिए मानदण्डों का निर्धारण किया गया। यह व्यवस्था की गयी कि सभी शिक्षक पढ़ायें और सभी छात्र पढ़े। इसके लिए तीन उपाय बताये गए (क) शिक्षकों को अधिक सुविधायें तथा जवाबदेही, (ख) छात्रों-हेतु बेहतर सुविधायें, (ग) संस्थाओं में प्राथमिक सुविधाओं की व्यवस्था और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर निर्धारित मानदण्डों के आधार पर शिक्षण-संस्थाओं के कार्य के मूल्यांकन की पद्धति का निर्माण करना।
(7) दक्षता एवं प्रभावकारिता को प्रोत्साहन – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत सभी स्तरों पर दक्षता लाने तथा प्रभावकारिता को प्रोत्साहन देने के लिए मानदण्डों का निर्धारण किया गया। यह कहा गया कि संस्थाओं एवं व्यक्तियों के उत्कृष्ट कार्य को मान्यता दी जायेगी और पुरस्कृत किया जायेगा। घटिया स्तर की संस्थाओं को उभरने से रोका जायेगा।
(8) शैक्षिक अपव्यय को समाप्त करने का संकल्प- ‘नवीन शिक्षा-नीति’ में शैक्षिक अपव्यय को रोकने का संकल्प लिया गया। पढ़ाई छोड़ देने वाले और निरक्षर छात्रों की समस्या के सम्बन्ध में विशेष ध्यान दिया गया। यह कहा गया कि 1990 ई. तक 11 वय वर्ग के सभी बालक पाँच वर्ष की विद्यालय-शिक्षा अथवा अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त कर लें। इसी तरह 1995 ई. तक 14 वर्ष के सभी बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जायेगी।
(9) आपरेशन-ब्लैकबोर्ड – नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि जितने भी प्राथमिक विद्यालय हैं उनमें से अधिकतर प्राथमिक विद्यालय एकल-शिक्षक वाले हैं। इन विद्यालयों के पास न ही अपने भवन हैं और न ही शैक्षिक उपकरण। ‘नई शिक्षा नीति’ के अन्तर्गत इस तरह के विद्यालयों को आवश्यक सुविधायें उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी। यह कहा गया कि प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक होंगे, जिनमें एक महिला होगी। धीरे-धीरे स्थिति को सुधारने के लिए क्रमिक अभियान प्राप्त करने का निश्चय किया गया जिसका सांकेतिक नाम ‘ऑपरेशन ब्लैक-बोर्ड’ होगा।
(10) डिग्री को नौकरी से अलग करना – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ की एक प्रमुख विशेषता डिग्री को नौकरी से अलग करना है। नौकरी-हेतु डिग्री आवश्यक नहीं होगी, परन्तु यह व्यवस्था, चिकित्सा, विधि, इंजीनियरिंग और शिक्षण आदि पर लागू नहीं होगी। इसी प्रकार मानविकीय, सामाजिक विज्ञान आदि में, जहाँ विषेषज्ञों की आवश्यकता होती है, एकेडमिक अर्हताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। उन सेवाओं में डिग्री को अलग रखा जायेगा जिनके लिए विश्वविद्यालय की डिग्री आवश्यक नहीं है। नौकरियों को डिग्री से अलग करने के साथ ही क्रमिक रूप में एक ‘राष्ट्रीय परीक्षण-सेवा’ प्रारम्भ की जायेगी जिससे प्रत्याशियों की उपयुक्तता की परख की जायेगी।
(11) खुला विश्वविद्यालय और दूर अध्ययन – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ में उच्च शिक्षा के अन्तर्गत खुले विश्वविद्यालय और दूर अध्ययन की संकल्पना की गयी। यह संकल्प लिया गया कि उच्च शिक्षा संस्थाओं में छात्रों की बढ़ती हुयी भीड़ तथा प्रवेश की समस्या से निपटने हेतु ‘मुक्त विश्वविद्यालय’ (Open University) की स्थापना की जायेगी। ‘इन्दिरा गाँधी खुले विश्वविद्यालयों’ को और अधिक विकसित करने का निश्चय किया गया।
(12) नवोदय विद्यालय – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ की एक अन्य प्रमुख विशेषता नवोदय विद्यालयों की स्थापना है। इसे प्रतिनिर्धारक विद्यालय (Pace-Setting University) भी कहा जाता है। इस प्रकार के विद्यालय विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में मेधावी छात्रों को गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु खोले जायेंगे। प्रत्येक जिले में एक नवोदय विद्यालय की स्थापना की योजना बनायी गयी। इन विद्यालयों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के बच्चों हेतु आरक्षण रहेगा। नवोदय विद्यालयों में जिन छात्रों को प्रवेश दिया जायेगा उन्हें निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जायेगी। भोजन, वस्त्र, पुस्तकें एवं अन्य पठन-सामग्री निःशुल्क प्रदान की जायेगी।
(13) परीक्षा-प्रणाली में सुधार – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत परीक्षा-प्रणाली में सुधार लाने की भी बात कही गयी। यह कहा गया कि अब अंकों के स्थान पर ग्रेड दिए जायेंगे। इससे छात्रों के असंतोष को दूर किया जा सकेगा। सतत् मूल्यांकन की प्रणाली अपनायी जायेगी जिससे विद्यार्थियों में नियमित अध्ययन की आदत पड़े। बाह्य परीक्षाओं को कम करने का भी आग्रह किया गया।
(14) शिक्षा का आधुनिकीकरण – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत कम्प्यूटरीकरण पर विशेष बल दिया गया। साक्षरता के विकास में इस तकनीकी का भरपूर प्रयोग किया जायेगा। सेटेलाइट और पत्राचार शिक्षा का और अधिक विकास किया जायेगा तथा दूरदर्शन और वीडियों कैसेट का भी पूर्ण लाभ उठाया जायेगा।
(15) अखिल भारतीय शिक्षा-सेवा का गठन – ‘नवीन शिक्षा-नीति’ के अन्तर्गत अखिल भारतीय शिक्षा-सेवा के गठन की बात भी कही गयी परन्तु कुछ राज्यों में इसका विरोध हुआ।