B.Ed. Sem 4-वैदिक एवं बौद्ध शिक्षा प्रणालियों की तुलना (Comparison of Vedic and Buddha Education System)

B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes

B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है। 

वैदिक एवं बौद्ध शिक्षा प्रणालियों की तुलना (Comparison of Vedic Education System and Buddha Education System)

भारत में वैदिक काल 2500 ई० पू० से 500 ई० पू० तक था। इसमें जिस शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ उसे वैदिक शिक्षा प्रणाली अथवा ब्राह्मणीय शिक्षा प्रणाली कहते हैं और उसके बाद बौद्ध काल शुरू हुआ जो 500 ई० पू० से 1200 ई० तक था। इसमें बौद्धों द्वारा जिस शिक्षा प्रणाली का विकास हुआ उसे बौद्ध शिक्षा प्रणाली कहते हैं। यहाँ हम वैदिक शिक्षा प्रणाली और बौद्ध शिक्षा प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और उनकी समानताओं और असमानताओं के बारे में जानेंगे। 

वैदिक शिक्षा प्रणाली (ब्राह्मणीय) और बौद्ध शिक्षा प्रणाली में समानताएँ (Similarities of Vedic Education System and Buddha Education System) :

वैदिक शिक्षा प्रणाली एवं बौद्ध शिक्षा प्रणाली में समानताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षा राज्य के नियन्त्रण से मुक्त थी।
  2. इन दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षण संस्थाओं की आय के मुख्य स्त्रोत दान और भिक्षा थे।
  3. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षा का संगठन प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा दो स्तरों में किया गया था।
  4. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षा के उद्देश्य लगभग समान थे। इसमें छात्रों के चरित्र निर्माण पर विशेष बल दिया जाता था।
  5. दोनों शिक्षा प्रणालियों की पाठ्यचर्या में तब तक विकसित समस्त ज्ञान एवं कला-कौशलों को स्थान दिया गया था।
  6. दोनों शिक्षा प्रणालियों में सामान्य विषयों को पढ़ाने के लिए मौखिक विधियों (व्याख्या, व्याख्यान, प्रश्नोत्तर एवं वाद-विवाद) का और क्रियात्मक विषयों को पढ़ाने के लिए प्रदर्शन एवं अभ्यास विधियों का प्रयोग किया जाता था।
  7. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षकों के लिए योग्य एवं संयमी होना आवश्यक था और शिक्षकों को उच्च स्थान प्राप्त था।
  8. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षार्थियों को शिक्षा संस्थाओं के नियमों का कठोरता से पालन करना होता था। वे सादा एवं संयमित जीवन जीते थे और व्यसनों से दूर रहते थे।
  9. दोनों शिक्षा-प्रणालियों में शिक्षक और शिक्षार्थियों के बीच पवित्र और मधुर सम्बन्ध थे।
  10. दोनों शिक्षा प्रणालियों में शिक्षण संस्थाएँ आवासीय थीं, इनमें प्रवेश के समय छात्रों का क्रमशः उपनयन और पवज्जा संस्कार होता था और इनकी व्यवस्था शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों मिलकर करते थे।

वैदिक शिक्षा प्रणाली और बौद्ध शिक्षा प्रणाली में असमानताएँ (Dissimilarities of Vedic Education System and Buddha Education System) :

वैदिक शिक्षा प्रणाली और बौद्ध शिक्षा प्रणाली में कई असमानताएँ देखने को मिलती हैं जो इस प्रकार हैं:
  1. वैदिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षा पर गुरुओं का नियन्त्रण होता था, बौद्ध शिक्षा प्रणाली में यह बौद्ध संघों के नियन्त्रण में थी। 
  2. वैदिक शिक्षा प्रणाली में केवल शिष्य भिक्षा माँगते थे और बोलकर माँगते थे जबकि बौद्ध शिक्षा प्रणाली के गुरु और शिष्य दोनों शिक्षा माँगते थे और मौन होकर माँगते थे। 
  3. वैदिक शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था परिवारों में होती थी लेकिन बौद्ध शिक्षा प्रणाली में इसकी शिक्षा की व्यवस्था मठों एवं विहारों में होती थी। 
  4. वैदिक शिक्षा में वैदिक धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी और बौद्ध शिक्षा में बौद्ध धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी। 
  5. वैदिक शिक्षा प्रणाली में सामान्यतः व्यष्टि शिक्षण होता था लेकिन बौद्ध शिक्षा प्रणाली में सामान्यतः सामूहिक शिक्षण होता था। 
  6. शिक्षण विधियों में वैदिक काल की अपेक्षा बौद्ध काल में शिक्षार्थियों की भागेदारी अधिक थी। वैदिक काल में स्वाध्याय विधि के लिए अवसर नहीं थे, बौद्ध काल में पुस्तकालयों के विकास के लिए स्वाध्याय विधि का मार्ग प्रशस्त हुआ। 
  7. वैदिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का माध्यम विशुद्ध संस्कृत भाषा थी लेकिन बौद्ध शिक्षा प्रणाली में शिक्षा का माध्यम लोक भाषा पाली थी। 
  8. वैदिक शिक्षा प्रणाली में आन्तरिक अनुशासन पर अधिक बल रहता था, बौद्ध शिक्षा प्रणाली में बाह्य अनुशासन पर अधिक बल दिया जाता था। 
  9. वैदिक शिक्षा प्रणाली में केवल गुरु ही छात्रों के आचरण पर दृष्टि रखते थे लेकिन बौद्ध शिक्षा प्रणाली में गुरु और शिष्य दोनों एक-दूसरे के आचरण पर दृष्टि रखते थे। 
  10. वैदिक शिक्षा प्रणाली में केवल ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति ही शिक्षण कार्य करते थे लेकिन बौद्ध शिक्षा प्रणाली में ऐसा नहीं था। यहां किसी भी वर्ण के व्यक्ति (पुरुष अथवा स्त्री) भिक्षु शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिक्षण कार्य कर सकते थे। 

आधुनिक शिक्षा के लिए ग्रहण करने योग्य तत्त्व (Acceptable Elements for Modern Education) :

यद्यपि बौद्धकालीन शिक्षा का भारत से लोप हो चुका है लेकिन इसके कुछ तत्त्व आज भी भारतीय शिक्षा के लिए ग्रहण करने योग्य हैं। इनका संक्षेप में उल्लेख निम्नलिखित है- 
 
  1. छात्रों का जीवन– बौद्ध युग में छात्रों के जीवन के दो प्रमुख आदर्श थे- सादगी एवं श्रेष्ठ विचार। इन आदर्शों के होते हुए भी उनके लिए तपस्या पूर्णजीवन के बजाय सुख-सुविधापूर्ण जीवन अच्छा माना जाता था। उन्हें भोजन, निवास, चिकित्सा आदि की सुविधायें प्रदान की जाती थीं। आधुनिक भारत में इस मध्यम मार्ग का अनुसरण पूर्णतया समीचीन प्रतीत होता है। छात्रों को आधुनिक आविष्कार से प्राप्त होने वाली सुख-सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें सादगी और श्रेष्ठ विचारों के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए  प्रेरित किया जाना चाहिए। 
  2. छात्रों के अधिकार– बौद्ध युग में जब छात्र को भिक्षु के रूप में प्रवेश करने की आज्ञा प्राप्त हो जाती थी तो उसे पूर्ण स्वतन्त्रता एवं जीवन-सम्बन्धी अधिकार प्राप्त हो जाते थे। आधुनिक भारतीय शिक्षा में इसकी अत्यधिक आवश्यकता है। छात्रों को शिक्षण संस्थाओं से सम्बन्धित सभी कार्यों में भाग लेने की स्वतन्त्रता एवं अधिकार होना चाहिए। डॉ० महेश चन्द्र सिंघल ने लिखा है, “आज भारतीय विद्यालयों के समस्त उपकुलपतियों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि शिक्षा के विभिन्न पक्षों में, जिनमें प्रशिक्षण भी सम्मिलित है, किस सीमा तक छात्रों को सम्मिलित किया जाय और उन्हें अधिकार प्रदान किया जाय।” 
  3. अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा का केन्द्र– बौद्ध युग में भारत अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा का केन्द्र था। दूर दूर के देशों से आकर छात्र यहाँ अध्ययन करते थे और अपने देश लौटकर वहाँ दया, प्रेम, अहिंसा, सत्य, बौद्ध धर्म, विश्व-बन्धुत्व आदि का संदेश फैलाते थे। इस समय भी भारत को प्रेम, शान्ति और अहिंसा के सिद्धान्तों में अग्रदूत माना जाता है। आधुनिक भारत एक बार पुनः अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा का केन्द्र बनकर इन सिद्धान्तों का विश्व में व्यापक प्रसार कर सकता है।
  4. शिक्षण संस्थाओं का जनतन्त्रीय संगठन– बौद्ध युग में शिक्षण संस्थाएँ बाह्य नियन्त्रण से मुक्त थीं तथा उनका संगठन जनतन्त्रीय आधार पर किया जाता था। आज भारत में अनेक ऐसी शिक्षण संस्थायें है जो न तो बाह्य नियन्त्रणा से मुक्त हैं और न उनका संगठन जनतन्त्रीय है। इन संस्थाओं को स्वतन्त्र बौद्ध युग की शिक्षा संस्थाओं के अनुरूप बनाया जाना आवश्यक है।

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