B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।
बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य:
बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली भारत की पृष्ठभूमि एवं वातावरण में विकसित हुई एक शिक्षा प्रणाली है। वैदिक-युगीन शिक्षा तथा बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्यों एवं आदर्शों में बहुत कुछ समानता दिखाई देती है। इस युग की शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य थे-
- निर्वाण प्राप्ति में सहायता प्रदान करना- बौद्ध धर्म की प्रमुख मान्यता थी कि दुःख का प्रमुख कारण अज्ञान अथवा अविद्या है। इसलिए इस काल की शिक्षा का उद्देश्य धार्मिक भावना का उदय करना और शिक्षा द्वारा ज्ञान प्राप्त करके “निर्वाण प्राप्त करने में सहायता देना था।”
- चरित्र-निर्वाण- उस समय सदाचार एवं संयम पर विशेष बल दिया जाता था। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को सात्विक जीवन व्यतीत करने योग्य बनाना और उसके चरित्र का निर्माण करना था। मठ एवं विहारों में प्राचीन वैदिक-शिक्षा की तरह ही ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करने की शिक्षा प्रदान की जाती थी।
- व्यक्तित्व का विकास- बौद्धकालीन शिक्षा का एक अन्य उद्देश्य आत्मज्ञान और आत्मानुशासन द्वारा व्यक्तित्व का विकास करना था।
- सामाजिक कुशलता की वृद्धि- बौद्ध-युग की शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य छात्रों में सामाजिक कुशलता एवं नागरिकता का विकास करना था। इसमें छात्रों को व्यावहारिक और व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाती थी।
- राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार- बौद्ध-युगीन शिक्षा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और उसका प्रसार करना था। इस युग में विदेशों में धर्म-प्रचार के साथ प्राचीन संस्कृति का भी प्रसार किया गया।
बौद्धकालीन शिक्षा में पब्बज्जा संस्कार का महत्त्व:
वैदिक कालीन शिक्षा में जिस प्रकार छात्रों का उपनयन संस्कार किया जाता था उसी प्रकार बौद्ध में पब्बज्जा अथवा प्रव्रज्या संस्कार होने के बाद ही छात्र विद्यालय में (मठों में) शिक्षा पाने का अधिकारी होता था। प्रव्रज्या का अर्थ होता है- बाहर जाना। इसका तात्पर्य था- छात्र का अपने परिवार से अलग होकर बौद्ध मठ में प्रवेश करना। बौद्ध ग्रन्थ ‘विनयपिटक’ में प्रव्रज्या संस्कार को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है-
“छात्र अपने सिर के बाल मुड़वाता था, पीले वस्त्र पहनता था फिर मठ के भिक्षुओं के चरणों में अपना माथा टेकता और पालथी मारकर बैठ जाता था।” उसके उपरान्त मठ का श्रेष्ठ भिक्षु विद्यार्थी को ‘शरणत्रयी’ प्रदान करने के लिए निम्न शब्दों को तीन बार कहलवाता था-
“बुद्धं शरणं गच्छामि,
धम्मं शरणं गच्छामि,
संघं शरणं गच्छामि”
इस संस्कार के बाद छात्र को दस आदेश दिये जाते थे और इन आदेशों का पालन करना प्रत्येक छात्र के लिए आवश्यक होता था। इन्हीं दस आदेशों का पालन करते हुये छात्र बौद्ध शिक्षा को विधिवत् प्राप्त कर सकता था। ये दस आदेश निम्न थे:
(i) अशुद्धता से दूर रहना
(ii) असत्य भाषण न करना
(iii) जीव-हत्या न करना
(iv) चोरी न करना
(v) मादक वस्तुओं का सेवन न करना
(vi) श्रृंगार प्रसाधनों का प्रयोग न करना
(vii) नृत्य, संगीत, तमाशा आदि के पास न जाना
(viii) ऊँचे बिस्तर पर न सोना
(ix) वर्जित समय पर भोजन न करना
(x) सोने-चाँदी का दान न देना।
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बौद्धकालीन शिक्षा के दोष:
बौद्धकालीन शिक्षा में निम्नलिखित दोष थे-
- बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली में धार्मिक तत्त्वों को ही अधिक प्रधानता प्रदान की जाती थी यही इसकी सबसे बड़ी खराबी थी।
- इस काल की शिक्षा में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया जाता था। हिंसा की मनाही सर्वत्र थी।
- चूँकि बौद्ध शिक्षा-प्रणाली में जनतान्त्रिक विचारों का समावेश हो गया था, इसलिये स्वेच्छाचारिता का फैलाव हुआ।
- इस काल में स्वजीवन की पवित्रता पर तो ध्यान दिया गया परन्तु समाज के विकास की ओर किसी का ध्यान नहीं गया।
- बौद्ध शिक्षा पूर्ण रूप से भगवान बुद्ध के धार्मिक सिद्धान्तों पर आधारित थी। भिक्षु भगवान बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का प्रचार करने में लगे रहते थे।
- भिक्षु जब भिक्षुणियों के साथ रहने लगे तो बौद्ध विहारों का त्याग और ब्रह्मचर्य तथा तपस्या का जीवन जाता रहा। साधना की वह दीपशिखा हिलने लगी और उसके स्थान पर विलास का प्रकाश फैल गया।
- उस समय श्रम का महत्त्व घट गया। इसलिये शिल्प के कार्यों को बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था।
- स्त्री शिक्षा केवल उच्च वर्ग तथा व्यावसायिक वर्ग तक ही सीमित रह गयी थी।