B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes
वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Vedic period education)
1. ईश्वर भक्ति एवं धार्मिकता (Infusion of Spirit of Piety and Religiousness)– वैदिककाल में धर्म को बहुत ही आदर की दृष्टि से देखा जाता था। ऋषि, महर्षि, पुरोहित आदि लोग शिक्षा का निर्धारण तथा शिक्षा देने का कार्य करते थे। इस काल की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की भक्ति करना तथा धर्म के नियमों का कठोरता के साथ पालन करना था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था थी। बालक को नियमपूर्वक दैनिक कार्य करने होते थे। वह विभिन्न धार्मिक कार्यों में सम्मिलित होता था और संध्या-पूजन भी विधिवत् करता था। इस प्रकार गुरुकुल का सारा वातावरण धार्मिक भावना से भरा-पूरा था।
2. चरित्र निर्माण (Formation of Character)–
- वैदिक कालीन शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के चरित्र का निर्माण करना था। उस समय एक विद्वान से एक चरित्रवान व्यक्ति को उत्तम समझा जाता था। मनुस्मृति में ऐसा कहा गया है कि “उन वेदों के विद्वानों से जिनका जीवन पवित्र नहीं है, वह व्यक्ति कहीं अच्छा है जो सच्चरित्र है परन्तु वेदों का कम ज्ञान रखता है।”
- गुरुकुल की शिक्षा में चरित्र निर्माण पर अत्यधिक बल दिया जाता था। इस कार्य के लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना, पाठ्य-पुस्तकों में दिए गए सदाचार के उपदेशों का पालन करना, आचार्यों के द्वारा सदाचार के उपदेशों को सुनना, राष्ट्र के महान पुरुषों के आदर्शों की विद्यार्थियों के सामने पुनरावृत्ति की जाती थी तथा छात्रों के चरित्र का निर्माण करने के लिए उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता था। इस सम्बन्ध में डॉ० वेदमित्रा का कहना है-“विद्यार्थियों के चरित्र का निर्माण करना, शिक्षा का एक आवश्यक उद्देश्य माना जाता था।”
3. व्यक्तित्व का विकास करना (Personality Development)– वैदिककाल की शिक्षा में बालक के व्यक्तित्व निर्माण पर विशेष बल दिया जाता था। इसके अंतर्गत आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मसंयम, न्याय, विवेक, कुशल वक्ता होना, वाद-विवाद करने की योग्यता होना, आदर्श चरित्रवान होना आदि गुण आवश्यक समझे जाते थे। इस कार्य के लिए व्यक्ति में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मसंयम, न्याय आदि गुणों का विकास किया जाता था तथा समय-समय पर गोष्ठियाँ की जाती थीं और उनमें भाषण देने का अवसर दिया जाता था। ये सब जो गुण बालकों में लाये जाते थे इनका केवल सैद्धान्तिक पक्ष ही नहीं बल्कि इसके क्रियात्मक पक्ष को भी महत्त्व दिया जाता था।
4. नागरिक तथा सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करने योग्य बनाना (Inculcation of Civic and Social Duties)–
- वैदिक कालीन शिक्षा का एक उद्देश्य बालकों को नागरिक तथा सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करने योग्य बनाना भी था। इसके लिए बच्चों में स्वार्थरहित भावना हो और वह दूसरों के लाभों को भी ध्यान में रखे उन्हें ऐसी शिक्षा देना अनिवार्य था।
- बालकों को इस बात का बोध कराया जाता था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे समाज में ही रहकर अपना जीवन व्यतीत करना है। व्यक्ति को अपने समाज तथा घर, परिवार और समाज के प्रति उसके क्या उत्तरदायित्व होते हैं इन सभी बातों का ज्ञान कराया जाता था।
- गुरुकुल की शिक्षा समाप्त करके जब शिष्य अपने गुरुदेव से अलग होने लगता था तो गुरु उसे अतिथि सत्कार, दीन-दुखियों की सहायता तथा समाज सेवा आदि के उपदेश देकर भविष्य में अच्छे कार्यों को करने का आदेश देते थे। इन बातों से यह स्पष्ट है कि वैदिककाल में बालकों के सामाजिक तथा नागरिक भावना के विकास पर भी ध्यान दिया जाता था।
5. सामाजिक कुशलता का विकास करना (Promotion of Social Efficiency)– वैदिक कालीन शिक्षा में बालक को समाज में रहकर अपना जीवन सुखपूर्वक बिताने की भी शिक्षा दी जाती थी। इसके लिये उन्हें व्यावसायिक शिक्षा भी प्रदान की जाती थी जिससे कि बालक अपने व्यावहारिक जीवन में किसी प्रकार की असफलता का सामना न करने पाए। उसको शिक्षा द्वारा जीविकोपार्जन के योग्य बना दिया जाता था। उस समय वर्ण-व्यवस्था भी विकसित हो गई थी। छात्रों को उनके वर्ण के अनुसार ही कार्य की शिक्षा दी जाती थी। इस तरह की शिक्षा प्राप्त करके वे केवल अपने परिवार तथा समाज का ही नहीं बल्कि राष्ट्र तथा देश का कल्याण करने के भी योग्य हो जाते थे।
6. राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार करना (Preservation and Spread of National Culture)– वैदिक कालीन संस्कृति का एक उद्देश्य राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं उसका प्रसार करना था। उन्हें इस प्रकार की शिक्षा दी जाती थी कि वे अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा व्यावसायिक परम्परा का संरक्षण कर सकें। इस समय वर्ण-व्यवस्था तो थी ही, जिसके अनुसार लोग कार्य करते थे। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय संस्कृति सुरक्षा को बड़ा बल मिलता था, जैसे परिवार का बड़ा या पिता अपने पुत्र को अपने व्यवसाय की शिक्षा देता था, ब्राह्मण वेदों को कंठस्थ कर लेते थे तथा उसे अपने शिष्यों को भी कंठस्थ कराना अपना कर्तव्य समझते थे। इस तरह वैदिककाल में राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार शिक्षा तथा वर्ण-व्यवस्था के द्वारा विशेष रूप से होता था।
उक्त वर्णन से यह बात एकदम स्पष्ट हो जाती है कि वैदिककाल में शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना था ताकि वे अपनी, अपने परिवार की, समाज तथा राष्ट्र की लौकिक और पारलौकिक उन्नति में योग दे सकें।