B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।
वैदिककालीन शिक्षा के गुण तथा दोष (Merits and Demerits of Vedic Period Education)
वैदिककालीन शिक्षा के गुण (Merits of Vedic Period Education) :
वैदिककालीन शिक्षा के गुणों या विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत देखा जा सकता हैं-
- गुरुकुल प्रणाली– वैदिक शिक्षा की सर्वप्रमुख विशेषता उसकी गुरुकुल प्रणाली थी। इसमें छात्र 8 वर्ष की अवस्था में माता-पिता को छोड़कर गुरुगृह में प्रवेश करता था और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के पूर्व एक ब्रह्मचारी के रूप में शिक्षा प्राप्त करता था। गुरु छात्रों का ‘मानस पिता’ होता था। वह छात्रों को शिक्षा ही नहीं प्रदान करता था बल्कि उनके भरण-पोषण, वेश-भूषा आदि का भी प्रबन्ध करता था। इस तरह गुरुकुल प्रणाली के अन्तर्गत गुरु का घर छात्रों के लिए घर और विद्यालय दोनों का ही कार्य करता था।
- उपनयन संस्कार का महत्व– वैदिक युग में उपनयन संस्कार का विशेष महत्त्व था। इस संस्कार के बाद ही बालक का अध्ययन आरम्भ होता था। उपनयन संस्कार के बिना किसी भी बालक को ज्ञानार्जन का अधिकार नहीं था। जब तक उसका उपनयन संस्कार नहीं हो जाता था तब तक उसे शूद्र समझा जाता था। इस संस्कार के बाद वह नवीन जीवन प्रारम्भ करता था। जिसके कारण उसे ‘द्विज’ कहकर पुकारा जाता था।
- उचित समय पर शिक्षा का प्रबन्ध– वैदिक युग में यह मान्यता थी कि शिक्षा-बाल्यकाल से ही प्रारम्भ हो जानी चाहिए क्योंकि इसी अवस्था में बुद्धि ग्रहणशील, स्मृति प्रखर और मन संसारग्राही होता है इस कारण बालक में अच्छी आदतों की नींव डाली जा सकती थी। फलस्वरूप 8 वर्ष में उपनयन संस्कार के बाद शिक्षा प्रारम्भ हो जाती थी।
- व्यावहारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा पर बल– वैदिक युग में शिक्षा केवल बाह्य ही नहीं थी बल्कि व्यावहारिक भी थी और बालक को पूर्ण जीवन हेतु तैयार करती थी। छात्र गुरुकुल में गृहस्थ जीवन में काम आने वाली विभिन्न क्रियाओं को स्वयं करके सीखते थे। ‘व्यावसायिक शिक्षा’ में प्रायोगिक कार्य पर विशेष बल दिया जाता था।
- गुरु-शिष्य में पितृ-तुल्य सम्बन्ध– वैदिक युग में गुरु और शिष्य का वही सम्बन्ध होता था जो एक पिता और पुत्र का होता था। शिष्य ‘मानस पुत्र’ के रूप में गुरु की प्रत्येक आज्ञा प्रेमपूर्वक मानना अपना पवित्र कर्त्तव्य समझता था। वास्तव में वैदिक युग में गुरु-शिष्य का जितना मधुर और पवित्र सम्बन्ध था वह कालान्तर में देखने में नहीं मिलता।
- ब्रह्मचर्य जीवन पर बल– वैदिक युग में छात्र के ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया जाता था। प्रत्येक विद्यार्थी को 25 वर्ष की आयु तक बिना विवाह किए गुरुकुल में ही शिक्षा ग्रहण करना होता था। ब्रह्मचारियों को इन्द्रिय-निग्रह और आत्म-संयम के नियमों का पालन करना होता था। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि उसे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के आदर्श का पालन करना होता था।
- धार्मिक तत्त्वों का महत्त्व– वैदिक युग में धर्म की प्रधानता थी। इसके फलस्वरूप, शिक्षा में धार्मिक तथ्यों यथा-प्रार्थना, संध्या, यज्ञ, मंत्र, पूजा आदि को प्रमुख स्थान दिया जाता था। गुरुकुल में रहते हुए शिष्य इन धार्मिक कृत्यों को सम्पन्न करते हुए जीवनयापन करता था।
- चरित्र एवं व्यक्तित्व के विकास पर बल– वैदिक युग में शिक्षा केवल छात्र को जीविकोपार्जन हेतु तैयार करने के लिए ही नहीं दी जाती थी बल्कि उसके चरित्र और व्यक्तित्व के विकास पर भी विशेष बल दिया जाता था। गुरुकुल में दी जाने वाली समस्त शिक्षाओं जैसे- ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, नित्य पूजन, सदैव सत्य बोलना, सादा जीवन व्यतीत करना, सबसे प्रेम और दया का भाव रखना, इन्द्रिय-निग्रह, आत्मसंयम, आत्म-विश्वास आदि का उद्देश्य चरित्र और व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास था।
- दैनिक दिनचर्या का विशेष महत्त्व– वैदिककालीन शिक्षा-प्रणाली में दैनिक दिनचर्या का विशेष महत्त्व था। गुरुकुल में शिष्य सुबह से लेकर रात्रि को सोने से पूर्व तक अनेक दैनिक क्रियाओं में लगे रहते थे। वास्तव में नियमित दिनचर्या उनकी आदत में परिणत हो जाती थी। गुरुसेवा और कठिन शारीरिक परिश्रम के द्वारा विद्यार्थी ‘सेवा एवं श्रम’ के गौरव का पाठ स्वयं सीख लेते थे। साथ ही पूरे दिन व्यस्त रहने के फलस्वरूप अनुशासन की समस्या स्वयमेव हल हो जाती थी।
- साधारण दण्ड की व्यवस्था– वैदिक-युगीन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत अनुशासन के नियमों और कर्त्तव्यों की अवहेलना करने वाले विद्यार्थियों को कितना शारीरिक दण्ड दिया जाता था, इसके सम्बन्ध में मतैक्य नहीं है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उस युग में साधारण दण्ड की ही व्यवस्था थी। प्रायः दण्ड आध्यात्मिक समझाव-बुझाव और उपवास आदि होते थे। इस दण्ड-व्यवस्था का आधार आत्मसुधार होता था।
- भिक्षावृत्ति प्रथा– वैदिक शिक्षा प्रणाली में भिक्षावृत्ति की एक अनूठी प्रथा थी। गुरुकुल में रहने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को अपने गुरु के पालन-पोषण हेतु भिक्षा माँगकर लाना एक धार्मिक कृत्य था। विद्यार्थियों को भिक्षावृत्ति की प्रथा के फलस्वरूप निर्धन विद्यार्थियों को शिक्षा का अवसर प्राप्त होता था। विद्यार्थियों में धनी-निर्धन का भेदभाव समाप्त हो जाता था, अहंकार की भावना समाप्त हो जाती थी और प्रेम, उपकार, सहिष्णुता आदि मानवीय गुणों का विकास होता था साथ ही विद्यार्थियों को अपनी शिक्षा के लिए परिवार पर निर्भर नहीं होना पड़ता था। उनमें समाज के प्रति कृतज्ञता और कर्त्तव्य का भाव विकसित होता था। इस प्रथा के फलस्वरूप समाज अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक रहता था।
- पालन-पोषण और वातावरण पर अधिक बल– आधुनिक युग की भाँति वैदिक युग में भी यह मान्त्यता थी कि बालक के निर्माण में उसके स्वाभाविक वंशानुक्रम, पालन-पोषण एवं वातावरण का विशेष महत्त्व था। वैदिक युग के शिक्षाशास्त्री जन्मजात गुणों की अपेक्षा पालन-पोषण और परिस्थिति पर अधिक बल देते थे। अथर्ववेद में यह स्पष्ट किया गया है कि उचित शिक्षा अथवा अनुकूल परिस्थितियों के उपलब्ध कर देने से बालक को प्रत्येक वस्तु प्राप्त हो जाती है। इस मनोवैज्ञानिक विचार के आधार पर ही वैदिक युग में वर्ण-व्यवस्था जन्म के स्थान पर कर्म पर आधारित थी।
- विद्यार्थी जीवन के बाद स्वाध्याय का महत्त्व– वैदिक युग में शिक्षा समाप्ति के बाद जब विद्यार्थी गुरुकुल से अपने घर जाता था तो ‘समावर्तन समारोह’ के समय आचार्य विद्यार्थियों को यह उपदेश देता था कि वह गुरुकुल में पढ़े हुए ग्रन्थों का नियमित रूप से स्वाध्याय करता रहे। जीवन पर्यन्त स्वाध्याय में प्रमाद न करने के लिए कहा जाता था।
- सार्वजनिक और निःशुल्क शिक्षा– वैदिक युग में यह मान्यता थी कि ऋषि-ऋण से मुक्त होने के लिए प्रत्येक पुरुष और स्त्री ब्राह्मण अथवा वैश्य को शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए। सभी के लिए शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था की गयी थी। सभी छात्रों की भोजनादि आवश्यकताओं की पूर्ति भिक्षावृत्ति से हो जाती थी।
- बाहरी नियंत्रण से मुक्त– वैदिककालीन शिक्षा बाह्य नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त थी।
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वैदिककालीन शिक्षा के दोष (Demerits of Vedic Period Education) :
वैसे तो वैदिककालीन शिक्षा में अनेक गुण थे, लेकिन उसे दोषमुक्त नहीं माना जा सकता है। इस युग की शिक्षा में अनेक दोष थे जैसे आध्यात्मिकता पर विशेष बल, वेदों को ही प्रामाणिक मानना, हस्तकलाओं की अवहेलना आदि। वैदिकयुगीन शिक्षा के प्रमुख दोषों का उल्लेख निम्नलिखित है-
- वैदिककालीन शिक्षा धर्म प्रधान होने के कारण सांसारिक विकास की ओर कम ध्यान देती थी। इस प्रकार की शिक्षा से शिक्षार्थियों को पारलौकिक ज्ञान तो प्राप्त हो जाता था, परन्तु उसकी बुद्धि का विकास नहीं हो पाता था।
- प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा उससे सम्बद्ध विषयों को कोई स्थान प्रदान नहीं किया गया था।
- इस युग में वेदों को प्रामाणिक माना जाता था जिसके कारण शिक्षार्थियों की तर्कशक्ति का विकास नहीं हो पाता था क्योंकि वेदों में जो लिखा है वही बात सत्य है इसे मान लेने से शिक्षार्थी उन बातों पर तर्क-वितर्क नहीं करते थे।
- वैदिककालीन शिक्षा पूरी तरह से मौखिक थी। इसमें लेखन को महत्त्व नहीं दिया जाता था।
- प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के प्रत्येक विषय को अलग अलग करके पढ़ाया जाता था अर्थात् यहां समन्वय के सिद्धान्त का पूर्ण अभाव था।
- वैदिककालीन शिक्षा के पाठ्यक्रम में हस्तकलाओं को कोई स्थान नहीं दिया गया था क्योंकि शिक्षा केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित थी और उच्च वर्ग हस्तकार्य को हेय दृष्टि से देखता था।
- शिक्षा में दर्शन पर अत्यधिक बल दिया जाता था जिसके कारण शिक्षार्थियों में जीवन से पलायन करने की भावना विकसित होती थी।
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में वैदिककालीन शिक्षा के उपरोक्त दोषों को काफी सीमा तक समाप्त करने का प्रयास किया गया है। आज समस्त व्यक्तियों (चाहे वे किसी भी वर्ण अथवा जाति के हों) को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है और अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया है। इसके अतिरिक्त शूद्र वर्ण के बालकों को पढ़ाई हेतु छात्रवृत्तियाँ भी दी जा रही हैं। पाठ्यक्रम को भी विस्तृत बनाया गया है और समन्वय के सिद्धान्त को विशेष महत्त्व दिया गया है। इस प्रकार वैदिकयुगीन शिक्षा में व्याप्त दोषों को दूर करने के लिए आधुनिक शिक्षा में सराहनीय प्रयास किये गये हैं।