B.Ed. Sem 3- Unit 2 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के तृतीय सेमेस्टर के विषय शिक्षा में मापन तथा मूल्यांकन (Measurement and Evaluation in Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।
अंक स्तरीकरण प्रणाली (Grading System)- B.Ed. Notes
स्कोर मापन की यादृच्छिकीकरण प्रक्रिया के बाद भी, मापन में कुछ त्रुटियां रह जाती हैं, जिन्हें स्कोरों को उचित वर्ग अंतरालों या स्तरों में विभाजित करके कुछ हद तक कम करने की आवश्यकता होती है। प्रत्येक वर्ग अन्तराल (Grade) में कुछ क्रमिक प्राप्तांक रहते हैं।
किन्तु प्राप्तांक का यह संप्रत्यय कि प्राप्तांक की विश्वसनीयता त्रुटियों की सीमा पर अवलम्बित रहती है, इस बात को दिखाता है कि वास्तविक प्राप्तांक (True Score) मूल प्राप्तांक से भिन्न भी हो सकता है। इसलिए 59 एवं 60 प्राप्तांक या 34 या 35 प्राप्तांक में स्पष्टतः अन्तर स्थापित कर पाना अत्यन्त कठिन है चूँकि त्रुटि-चर (Error Variance) की कल्पना से 59 प्राप्तांक भिन्न-भिन्न परीक्षक द्वारा या परीक्षक-गत विचलन द्वारा 59 से कम या अधिक भी हो सकता है।
इस प्रकार मूल-प्राप्तांक त्रुटि-चर के प्रभाव के परिणामस्वरूप एक-दूसरे पर आच्छादित होते रहते हैं और अपने वर्तमान अस्तित्व को खो सकते हैं। यही कारण है कि वास्तविक प्राप्तांक की अज्ञानता के परिणामस्वरूप परिस्थितिजन्य प्रभाव, मूल प्राप्तांकों के स्थान पर हावी हो जाते है। इस प्रकार अंकन (Marking) को केवल अंक-मापन (Scaling) से वरन् अंक स्तरीकरण (Grading) के साथ सम्मिलित किया जाता है।
बैरो का अंकीय-अंक स्तर जो 1 से 9 तक विस्तृत है, दांडेकर (1978) के अंक के प्रसामान्य वितरण के concept पर आधारित है। इसी प्रकार हिल (1971) के द्वारा सुझाए गए नौ अक्षरीय अंक स्तर बैरो (1971) के नौ अंकीय या अक्षरीय अंक स्तर (Grades) का प्रयोग किया जाता है।
अंक स्तर के प्रयोग से विशेषतः उन छात्रों को लाभ पहुँचता है, जो दो श्रेणी के किनारे पर स्थित रहते हैं। इस प्रकार मूल प्राप्तांक को अर्थयुक्त बनाने के लिए उसे किसी मानक प्राप्तांक के मानक मध्यमान एवं मानक विचलन का प्रयोग कर उसका मानकीकरण (Standardization) कर मानक उपलब्धि परिवर्तित करना चाहिए। इस प्रकार मानक प्राप्तांकों में अंक मापन (Scaling) प्रक्रिया द्वारा परिवर्तित करने के बाद उसे उपयुक्त अंक स्तर (Grade) में वर्गीकृत कर उसे अर्थयुक्त बनाना कहीं अधिक उचित होता है। इस पद्धति से अनेक त्रुटियाँ भी दूर हो जाती है और साथ ही मानकीकृत मानव प्राप्तांक के आधार पर उसकी अर्थयुक्त विवेचना भी हो जाती है।
अंक-मापन (Scaling) एवं अंक-स्तरण (Grading) की प्रक्रिया के मूल प्राप्तांक का न केवल मानकीकरण हो जाता है बल्कि आच्छादित प्राप्तांक की समस्या भी दूर हो जाती है और एक ठोस, विश्वसनीय आधार पर मानक प्राप्तांक का वर्गगत (Within the Grade) विवेचन अंक स्तरण (Grading) के आधार पर किया जा सकता है जो कहीं अधिक अर्धयुक्त एवं वैध है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने निम्न अंक-स्तरण (Grading) पद्धति को प्रतिपादित किया। सामान्यतः शैक्षिक उपलब्धि की अर्थयुक्त विवेचना हेतु निम्न अंकीय या अक्षरीय अंक स्तरण (Number or letter grading) का प्रयोग किया जा सकता है-
अक्षर-वर्गान्तर | वर्ग-बिन्दु | प्रतिशत-प्राप्तांक |
O | 6 | 75 एवं ऊपर |
A | 5 | 65-74 |
B | 4 | 55-64 |
C | 3 | 45-54 |
D | 2 | 35-44 |
E | 1 | 25-34 |
F | 0 | 0-24 |
विभिन्न प्रकार के अंक-स्तरण (Grading) पद्धति प्रस्तावित किये गये हैं, परन्तु सरलीकरण की दृष्टि से पाँच बिन्दु मापनी, सात बिन्दु मापनी, नौ बिन्दु मापनी या ग्यारह बिन्दु मापनी, एक सौ बिन्दु मापनी का प्रयोग किया जाता है; किन्तु मापनी जितनी विस्तृत होती है, परीक्षक को उत्तर-पुस्तिकाओं के जाँचने में एवं अधिक-से-अधिक विश्वसनीय अंक प्राप्त करने में उतनी ही अधिक विभेदन शक्ति (Discrimination Power) की आवश्यकता होती है।
यद्यपि दो परीक्षार्थी किसी परीक्षा में एक-सा अंक प्राप्त किये या दोनों को शून्य अंक प्राप्त हुआ, फिर भी दोनों परीक्षार्थियों द्वारा अर्जित प्राप्तांक गणित की दृष्टि से तो समान प्रतीत होता है किन्तु मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वे समान नहीं होंगे। उनमें से एक शून्य वास्तविक शून्य (True zero) हो सकता है परन्तु दूसरा शून्य प्रात्यक्षिक शून्य (Apparent zero) हो सकता है। ऐसा छात्र जिसने कभी उस विषय-वस्तु को नहीं पढ़ा है, उसे शून्य अंक प्राप्त कर लेने पर वास्तविक शून्य की संज्ञा दी जा सकती है, परन्तु जिस छात्र ने सम्पूर्ण वर्ष पढ़ाई की है और इसके बावजूद भी शून्य अंक अर्जित किया है तो वह प्रात्यक्षिक शून्य ही कहलाएगा।
इस प्रकार दो छात्रों द्वारा समान प्राप्तांक भिन्न-भिन्न अर्थ स्पष्ट करते हैं। अंकन अंक-मापन एवं अंक-स्तरण की प्रक्रिया जो उपरोक्त दी गई है उससे परीक्षा की विश्वसनीयता कुछ सीमा तक अवश्य प्रस्थापित होती है।