B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।
वैदिककालीन शिक्षा (Vedic period education): अर्थ, महत्त्व तथा शिक्षण-विधि
शिक्षा का बीजारोपण आज से लगभग 4000 वर्ष पूर्व प्राचीन भारत में हुआ। इस शिक्षा के सुसम्बद्ध रूप का दर्शन वैदिक युग में ही देखने को मिलते हैं। ऋग्वेद का रचना काल 2500 ई० पू० माना जाता है, तब से लेकर बौद्ध काल तक के सम्पूर्ण काल खण्ड को वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है। कुछ विद्वान वैदिक काल और बौद्ध युग के आरम्भ के बीच के काल का पुनर्विभाजन करते हैं और उसे उपनिषद् और ब्राह्मण काल की संज्ञा देते हैं और यही कारण है कि उत्तर वैदिककालीन शिक्षा को ‘ब्राह्मणीय शिक्षा‘ के नाम से भी जाना जाता है परन्तु अध्ययन की सुविधा के लिए समस्त प्राचीन भारतीय शिक्षा को वैदिक-कालीन शिक्षा ही कहा जाता है।
वैदिककालीन शिक्षा का अर्थ (Meaning of Vedic period Education):
प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य में शिक्षा शब्द का प्रयोग कई रूपों में किया गया है, जैसे- विद्या, ज्ञान, प्रबोध और विनय आदि। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने ‘शिक्षा’ शब्द का प्रयोग व्यापक और सीमित दोनों ही अर्थों में किया है। व्यापक अर्थ में व्यक्ति को सभ्य और उन्नत बनाना ही शिक्षा का उद्देश्य होता है और शिक्षा की यह प्रक्रिया आजीवन चलती रहती है। सीमित अर्थ में शिक्षा का तात्पर्य उस औपचारिक शिक्षा से है जिसे प्रत्येक बालक अपने प्रारम्भिक जीवन के कुछ वर्षों में गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करते हुए अपने गुरु से प्राप्त करता है।
प्राचीन भारत में शिक्षा न तो पुस्तकीय ज्ञान का पर्यायवाची थी और न ही जीवनयापन का साधन। इसके बजाय ‘वैदिककालीन शिक्षा‘ का तात्पर्य उस ज्ञान से था जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके तथा वह धर्म के मार्ग का अनुसरण करते हुए मानव जीवन के चरम लक्ष्य अर्थात मोक्ष की प्राप्ति कर सके। शिक्षा, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में पथ-प्रदर्शन करने वाला एक ऐसा प्रकाश था जिसे प्राप्त करके व्यक्ति जीवन के चरम लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता था।
वैदिककालीन शिक्षा का महत्त्व (Importance of Vedic period Education) :
- वैदिक युग में शिक्षा को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया था। इसे प्रकाश का स्रोत अन्तर्दृष्टि, अन्तज्योति, ज्ञान चक्षु और तीसरा नेत्र माना जाता था। उस युग में यह मान्यता थी कि शिक्षा का प्रकाश व्यक्ति के समस्त संशयों का उन्मूलन करता है और उसकी सभी बाधाओं को दूर करके सही मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करता है।
- शिक्षा, ज्ञान प्रदान करती है और ज्ञान से मानव के अन्तर-चक्षु खुल जाते हैं। यही कारण है कि ज्ञान को तीसरा नेत्र माना जाता है।
- शिक्षा से प्राप्त अन्तर्दृष्टि व्यक्ति की बुद्धि-विवेक और कुशलताओं में वृद्धि करती है तथा उसके सुख, सुयश और समृद्धि में योगदान देती है।
- शिक्षा व्यक्ति को जीवन के यथार्थ महत्त्व को समझने की क्षमता प्रदान करती है और उसे मोक्ष को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती है।
- प्राचीन भारतीय मनीषियों की यह धारणा थी कि शिक्षा कामधेनु अथवा कल्पतरु की तरह व्यक्ति की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है तथा उसका सर्वांगीण विकास करके मोक्ष की ओर अग्रसर करती है। डॉ० ए० एस० अल्तेकर ने लिखा है– “शिक्षा को प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता था, जो हमारी शारीरिक, मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का निरन्तर एवं सामंजस्यपूर्ण विकास करके, हमारे स्वभाव को परिवर्तित करती है और उसे उत्कृष्ट बनाती है।”
वैदिककालीन शिक्षण-विधि (Method of Vedic period Teaching) :
वैदिककालीन भारत में शिक्षण विधि निम्न प्रकार की थी-
- मौखिक शिक्षा की प्रधानता– वैदिक काल में शिक्षा की विधि मौखिक थी। इसका प्रमुख कारण यह था कि उस समय लिखने के लिए पर्याप्त कागज नहीं थे और मुद्रण कला का विकास नहीं हो पाया था, इसलिए पुस्तकों का अभाव था। छात्र बहुत ध्यान से अपने गुरुओं के वचन को सुनते थे और उसे याद कर लिया करते थे। गुरु के उच्चारण का अनुकरण करना छात्रों के लिए बहुत आवश्यक था। छात्र जब शुद्ध उच्चारण कर लेते थे तो गुरु उसकी विधिवत् व्याख्या करते थे। छात्र पाठ्यवस्तु का मनन एकान्त में करते थे। किसी भी बात को बताने के लिए गुरु अत्यन्त ही मनोरंजक ढंग का प्रयोग करता थे।
- प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद और शास्त्रार्थ विधि का प्रयोग– गुरुजन किसी तथ्य का अध्ययन कराने के लिए प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग करते थे। छात्र प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकाओं को गुरु के सामने प्रस्तुत करते थे और गुरु उनकी शंकाओं का समाधान करते थे। इसके लिए वाद-विवाद और शास्त्रार्थ विधि का भी प्रयोग किया जाता था। इसके लिए स्मरण, मनन, चिन्तन, वक्तृत्व आदि शक्तियों का समुचित विकास होना आवश्यक होता है।
- अग्रशिष्य प्रणाली का प्रचलन– गुरु के आश्रम में जो छात्र कुशाग्र बुद्धि के होते थे वे निम्न छात्रों को पढ़ाते थे। इसी को अग्रशिष्य प्रणाली कहा जाता है। इस विधि को प्रयोग करने का लाभ यह था कि छात्रों को अध्यापन कला की भी जानकारी हो जाती थी। आजकल के प्रशिक्षण विद्यालयों की भाँति छात्र शिक्षण अभ्यास करते थे।
- उदाहरणों, सूत्रों तथा मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग– वैदिक काल की शिक्षा में ऊपर दी हुई विधियों के अलावा उपमा, रूपक, दृष्टान्त, लोकोक्ति, कहानियों आदि का भी प्रयोग किया जाता था। जहाँ आवश्यकता पड़ती थी वहां निगमन और आगमन विधि का भी प्रयोग किया जाता था। साथ ही सरल से कठिन की ओर चलना, ज्ञात से अज्ञात की ओर चलना तथा अन्य शिक्षण सूत्रों का भी प्रयोग किया जाता था। छात्रों में होने वाले व्यक्तिगत भेदों पर भी ध्यान दिया जाता था। चूँकि वेद संस्कृत भाषा में थे और संस्कृत भाषा का प्रयोग सभी लोग करते थे, इसलिए शिक्षा कार्य संस्कृत भाषा के ही माध्यम से ही किया जाता था।