B.Ed. Sem 4- Unit 1 notes
मध्यकालीन शिक्षा के गुण (Qualities of Medieval Education)
मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली के कई गुण थे जिनका वर्णन इस प्रकार है-
(1) निःशुल्क शिक्षा (Free Education) – मुस्लिमकाल में शिक्षा का शुल्क नहीं लिया जाता था। शिक्षा संस्थाओं का सारा खर्चा अमीर तथा राजा, महाराजा उठाया करते थे। कुछ संस्थाओं को आर्थिक व्यवस्था सामाजिक समितियों द्वारा की जाती थी।
(2) शिक्षा की अनिवार्यता (Compulsory Education) – मुसलमान बालकों के लिए शिक्षा लेना अनिवार्य होता था। इस्लाम धर्म में शिक्षा प्राप्त करने को एक धार्मिक कर्त्तव्य माना गया है। कुरान शरीफ में कहा गया है कि जो व्यक्ति ज्ञान ग्रहण करता है उसी को अल्लाह की इनायत हासिल होती है। अमीर अली (Amir Ali) ने ‘Spirit of Islam’ में कुरान शरीफ के इन्हीं विचारों का वर्णन किया है।
(3) धार्मिक और सांसारिक शिक्षा को समान महत्त्व (Equal Importance to Religious and Material Education) – मुस्लिम शिक्षा की विशेषता यह थी कि इसमें धार्मिक तथा लौकिक शिक्षा दोनों को बराबर महत्त्व दिया गया था। चूँकि मुस्लिम शिक्षा का उद्देश्य धर्म प्रचार करना था, इसलिए प्रत्येक शासक ने इसकी ओर ध्यान दिया। दूसरी ओर पुनर्जन्म में विश्वास न करने के कारण शिक्षा का वर्तमान जीवन में ही उपभोग की भावना शासकों तथा विद्यार्थियों में रही, इस कारण लौकिक साहित्य की भी पर्याप्त उन्नति हुई।
(4) साहित्य तथा इतिहास का विकास (Progress of Literature and History) – मुस्लिम शासकों के दरबारों में विद्वानों को आश्रय दिया जाता था, इसलिए इस काल में साहित्य के निर्माण में सहायता मिली। मुगलों के समय में उस समय के इतिहास को लिखने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। इस कारण मुस्लिम काल में इतिहास तथा साहित्य का विकास हुआ। अनेक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों की रचना हुई। इस कारण से हिन्दी साहित्य का विकास हुआ। जायसी का पद्मावत्, बिहारी की सतसई, शिवराज भूषण, रामचरितमानस की रचना इसी काल में हुई थी। ‘आइने अकबरी’, ‘बाबरनामा’, ‘हुमायूँनामा’ आदि ऐतिहासिक ग्रन्थ इसी काल की देन हैं। जियाउद्दीन बर्नी, अबुल फजल और बदायूँनी इसी काल के इतिहासकार थे।
(5) व्यावहारिकता (Practicability) – शिक्षा केवल शिक्षा के लिए न होकर ‘जीवन के लिए’ हुआ करती थी। इस काल में शिक्षा का उद्देश्य भावी जीवन को सुखी तथा समृद्धिशाली बनाना था। पाठ्यक्रम में जीवनोपयोगी विषयों को पढ़ाया जाता था। इस तरह उस काल की शिक्षा व्यावहारिक थी।
(6) शिक्षण संस्थाओं का व्यवस्थित स्वरूप (Established form of Educational Institutions) – इस काल में शिक्षा का स्वरूप व्यवस्थित होने लगा था जिससे प्राथमिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था हो गई थी। मकतबों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी मदरसों में प्रवेश पाते थे। इस काल में अनेक व्यवस्थित मकतब तथा मदरसे विकसित हो चुके थे।
(7) आदर्श गुरु-शिष्य सम्बन्ध (Ideal Teacher-Taught Relation) – वैदिक तथा बौद्धकाल की तरह इस काल में भी गुरु-शिष्य सम्बन्ध मधुर थे। विद्यार्थी अपने अध्यापक की आज्ञा का पालन तथा आदर करता था। अध्यापक भी विद्यार्थियों से पुत्रवत् स्नेह करते थे परन्तु प्राचीनकाल के सम्बन्धों जैसी श्रेष्ठता अब नहीं रह गई थी।
मध्यकालीन शिक्षा के दोष (Demerits of Medieval Education)
मध्यकालीन शिक्षा के निम्न दोष थे-
(1) आध्यात्मिकता का अभाव (Lack of Spirituality) – मुस्लिमकालीन शिक्षा धार्मिक अवश्य थी परन्तु उसमें आध्यात्मिक भावना का अभाव था। मुसलमानों का पुनर्जन्म में विश्वास नहीं था। इस कारण वे कोई काम अगले जन्म के लिए या पारलौकिक सुख के लिए नहीं करते थे। नैतिक शिक्षा पर इस काल में अधिक जोर नहीं दिया गया।
(2) जनसामान्य की शिक्षा का अभाव (Lack of Mass Education) – इस काल में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना नगरों तथा कस्बों में हुई थी तथा धार्मिक कट्टरता भी थी जिससे मुसलमानों के अलावा बहुसंख्यक हिन्दू समाज के बालक यहाँ शिक्षा नहीं ग्रहण करते थे। अतः यह शिक्षा जन-साधारण को शिक्षित बनाने में असफल रही। शिक्षा का प्रचार अधिकतर उच्च तथा मध्यम वर्ग में था तथा निम्न वर्ग के लोगों की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी।
(3) जनभाषा की उपेक्षा (Negligence of Mass Media) – मध्यकाल में बहुसंख्यक हिन्दू समाज की भाषा प्राकृत तथा अपभ्रंश थी। फारसी और अरबी तो बाहर से आने वाले मुसलमानों की भाषा थी परन्तु जनभाषा को शिक्षा का माध्यम न बनाकर फारसी को भाषा का माध्यम बनाया गया। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं का प्रचार नहीं हो सका।
(4) कठोर दण्ड-व्यवस्था (System of Hard Punishment) – इस काल में विद्यार्थियों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था थी। बालकों को छोटे-छोटे अपराधों पर लात-घूंसों से मारा जाता था। कठोर शारीरिक दण्ड की व्यवस्था होने से बालक पढ़ाई से भयभीत रहते थे तथा शिक्षा के प्रति उनमें अरुचि का भाव आ गया था।
(5) शिक्षा की व्यवस्था में अस्थिरता (Instability in Education System) – देश में मकतब तथा मदरसों की व्यवस्था करना शासकों का कार्य था। कोई-कोई शासक शिक्षा के प्रति रुचि रखते थे तब वे बहुत से मकतब तथा मदरसे खुलवा देते थे। उनके गद्दी से हटने के बाद यदि कोई कट्टर या अनुदार शासक गद्दी पर बैठता तो वह इन मकतबों और मदरसों की चिन्ता नहीं करता था। अतः बहुत से मकतब तथा मदरसे बन्द हो जाते थे। इसी तरह नये-नये शासक, नये-नये मकतब तथा मदरसे खोलते थे परन्तु पुराने खुले मकतबों तथा मदरसों की चिन्ता नहीं करते थे जिससे वे बन्द हो जाते थे। इस कारण शिक्षा व्यवस्था स्थिर न हो सकी।
(6) स्त्री शिक्षा की उपेक्षा (Negligence of Women Education) – मुस्लिम काल में पर्दा-प्रथा का जोर था जिससे लड़कियाँ तथा महिलायें, घरों से बाहर नहीं निकला करती थीं। अतः लड़कों के मकतबों तथा मदरसों में लड़कियों को पढ़ाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। केवल मध्यम वर्ग तथा राजघराने की लड़कियों की पढ़ाई घर पर ही हुआ करती थी जिससे स्त्री शिक्षा को बहुत क्षति पहुँची। डॉ० ए० एस० अल्तेकर के अनुसार मुस्लिम काल में केवल 1% ही स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं। इससे स्त्री शिक्षा की उपेक्षा प्रमाणित हो जाती है।


