B.Ed. Sem 2- Unit 2 notes
अणुगति सिद्धान्त के आधार पर ठोस, द्रव तथा गैस अवस्था की व्याख्या (Explanation of Solid, Liquid and Gaseous State at the Basis of Moleculars rotation Theory) :
(A) ठोस अवस्था (Solid State)-
- आकार– इस अवस्था में अणुओं के स्थिर स्थानों पर रहने के कारण ठोसों का आकार निश्चित होता है। ठोस अपने धारक (बर्तन) को पूर्णतया नहीं भर पाता है, क्योंकि इसके अणु प्रबल अन्तरा-अणुक बलों द्वारा कसकर संगठित रहते हैं।
- आयतन– ठोस पर दबाव डालने पर उसके आयतन में परिवर्तन नहीं होता क्योंकि इसके अणु पास-पास होते हैं। अतः ठोस का आयतन भी निश्चित होता है। गर्म करने पर इसके आयतन में उपेक्षणीय अन्तर आता है।
- गलन– ठोस को गर्म करने पर उसके अणुओं की स्थिर स्थिति के इधर-उधर कम्पन बढ़ने लगता है। एक विशेष ताप तक पहुँचकर अणु इतने गतिशील हो जाते हैं कि उनका आपसी ससंजक बल उन्हें स्थिर स्थिति में नहीं रख पाता है। इसके फलस्वरूप अणु अलग-अलग होकर स्वतन्त्र घूमने लगते हैं। अतः ठोस, द्रव का रूप धारण कर लेता है। ठोस के पिघलकर द्रव बनने की इस क्रिया को गलन कहते हैं। जिस निश्चित ताप पर ठोस पिघलकर द्रव बनता है, उसे गलनांक कहते हैं।
(B) द्रव अवस्था (Liquid State)-
1. आयतन– द्रव के अणुओं की गति पात्र की दीवारों तक ही सीमित रहती है तथा वे गैस के अणुओं की अपेक्षा बहुत पास-पास होते हैं। ये एक-दूसरे के वातावरण से बाहर नहीं निकल सकते हैं। अतः द्रवों के आयतन पर दाब का केवल उपेक्षणीय प्रभाव पड़ता है। इसीलिए द्रवों का आयतन निश्चित रहता है।
2. आकार– द्रवों के अणु गति करते रहते हैं जिसके फलस्वरूप इनके स्थान स्थिर नहीं रहते हैं। इसलिए द्रवों के आकार निश्चित नहीं होते हैं। जिस पात्र में द्रव रखा जाता है वह उसी का आकार ग्रहण कर लेता है।
3. तरलता– द्रव के अणुओं की गतिशीलता के कारण ही वे तरल होते हैं। द्रव की तरलता उसके अणुओं के ससंजक बल पर निर्भर करती है। जिन द्रवों के अणुओं का ससंजक बल अधिक होता है वे कम तरल तथा जिनका ससंजक बल कम होता है वे अधिक तरल होते हैं। जैसे ग्लिसरीन की तरलता कम तथा जल की अधिक होती है। अतः गाढ़े द्रवों में अणु कम तथा सरल द्रवों में अधिक गतिशील होते हैं।
4. वाष्पन– द्रव के अणु स्वतन्त्र रूप से गतिशील रहते हैं। इसी गतिशीलता के कारण वे आपस में टकराते हैं जिससे कुछ अणुओं की गतिज ऊर्जा इतनी बढ़ जाती है कि वे द्रव के तल को छोड़कर वाष्प में परिवर्तित हो जाते हैं। अणुओं के अधिक गतिमान होने के कारण द्रव से वाष्प अवस्था में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को वाष्पन कहते हैं।
इस प्रकार से अधिक ऊर्जा वाले अणुओं के निकल जाने पर द्रव की औसत गतिज ऊर्जा कम हो जाती है, अतः वाष्पन से द्रव का तापक्रम कम होता रहता है। द्रव का वाष्पन प्रत्येक ताप पर होता है, परन्तु कम ताप पर वाष्पन कम तथा अधिक ताप पर अधिक होता है। इसके अतिरिक्त द्रव के तल का क्षेत्रफल बढ़ने पर भी वाष्पन की दर बढ़ जाती है।
5. क्वथन– द्रव को गर्म करने पर उसके अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा बढ़ती है जिससे द्रव का ताप बढ़ने लगता है तथा वाष्पन की दर बहुत अधिक हो जाती है। गर्म करते रहने पर एक ऐसी स्थिति आ जाती है जबकि द्रव का ताप बढ़ना रुक जाता है तथा ताप स्थिर हो जाता है। इस स्थिर ताप पर अणुओं की गतिज ऊर्जा इतनी अधिक हो जाती है कि द्रव के अन्दर वाष्प के बुलबुले उठने लगते हैं जो द्रव के ऊपरी पृष्ठ पर आकर फूट जाते हैं तथा वाष्प, वायु में मिल जाती है। इस क्रिया को उबलना या क्वथन कहते हैं तथा उस निश्चित ताप को जिस पर द्रव उबलता है तथा द्रव का वाष्प दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है द्रव का क्वथनांक कहते हैं। क्वथनांक पर वाष्पन द्रव के अन्दर होने लगता है जिसके कारण द्रव में बुलबुले उठने लगते हैं।
(C) गैसीय अवस्था (Gaseous State)-
- आयतन– गैसीय अवस्था में अणु दूर-दूर होते हैं तथा प्रत्येक दिशा में स्वतन्त्र रूप से गति करते हैं। इसीलिए गैसों का आयतन अनिश्चित होता है। गैस पर दाब दुगुना करने पर उसका आयतन आधा रह जाता है। गर्म करने पर गैस का आयतन बढ़ता है। अतः गैस के आयतन पर दाब तथा ताप दोनों का प्रभाव पड़ता है।
- आकार– गैस के अणु भी द्रों की तरह गति करते रहते हैं अर्थात् उनके स्थान स्थिर नहीं होते हैं। इसीलिए गैसों के आकार अनिश्चित होते हैं। जिस भी पात्र में गैस भरी जाती है उसमें यह पूर्णतया समान रूप से फैल जाती है तथा उसी का आकार धारण कर लेती है।
- दाब– गैसों के अणु प्रत्येक दिशा में तीव्र गति करते हैं तथा पात्र की दीवारों से टकराते हैं। इन्हीं टक्करों के सामूहिक प्रभाव से गैस का दाब उत्पन्न होता है। यदि किसी गैस का आयतन आधा कर दिया जाए तो कम स्थान में अणुओं की संख्या बढ़ने से दीवारों पर टक्करों की संख्या दुगुनी हो जाती है जिससे दाब दुगुना हो जाता है। गैस को गर्म करने पर अणुओं की गति तीव्र हो जाती है जिससे उनकी दीवारों पर टक्करों की संख्या बढ़ जाती है। यदि आयतन निश्चित रहे तो टक्करों की संख्या बढ़ने से दाब बढ़ जाता है। अतः निश्चित आयतन पर ताप, दाब को प्रभावित करता है।
- गतिज ऊर्जा– गैसीय अवस्था में स्थितिज ऊर्जा पूर्णतया गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। अतः गैस की गतिज ऊर्जा सर्वाधिक होती है।
- द्रवण– गैस के अणुओं की पारस्परिक दूरी तथा गति द्रवों की अपेक्षा अधिक होती है। गैस पर दाब लगाने पर तथा उसका ताप कम करने पर अणु आसपास आते हैं तथा उनकी, गति मन्द होती जाती है। इस प्रकार, दाब लगाकर गैस को ठण्डा करने पर वह द्रव में परिवर्तित हो जाती है। गैस के द्रव बनने की इस प्रक्रिया को द्रवण कहते हैं।