B.Ed. Sem 4- Unit 2 notes
B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है।
परीक्षा-प्रणाली के दोषों को दूर करने के लिए विभिन्न अवसरों पर अनेक आयोगों, समितियों, शिक्षाविदों और अनुसंधानकर्ताओं ने विचार किया। उन्होंने आन्तरिक अथवा सतत् मूल्यांकन करने, अंकों के स्थान पर ग्रेड प्रणाली अपनाने, राष्ट्रीय परीक्षा प्रारम्भ करने, वस्तुनिष्ठ एवं लघु-उत्तरीय प्रश्नों का प्रयोग करने, प्रश्नों के विकल्पों को समाप्त करने, प्रश्न बैंकों का निर्माण करने, सपुस्तक प्रणाली अपनाने, परीक्षाओं का विकेन्द्रीकरण करने आदि के सुझाव दिए।
‘नवीन शिक्षा-नीति’ (New Education Policy) के अन्तर्गत मूल्यांकन को शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का अभिन्न अंग स्वीकार किया गया है। विभिन्न संकल्पों को प्राप्त करने के लिए एक बहुमुखी कार्यक्रम तैयार करने का निश्चय किया गया। इसके लिए अनेक कार्य-दल गठित किए जाने की बात कही गयी। एक कार्य दल को परीक्षा-सुधार-हेतु क्रियान्वयन कार्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी सुपुर्द की गयी। इस कार्य-सुधार के लिए कुछ अल्पकालीन और कुछ दीर्घकालीन सुधारों का सुझाव दिया। इन सुझावों का उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है-
(अ) अल्पकालिक परीक्षा-सुधार
कार्य दल ने इस सम्बन्ध में कई सुझाव दिए जो इस प्रकार हैं-
(1) विद्यालय स्तर पर अल्पकालिक परीक्षा-सुधार – विद्यालय स्तर पर परीक्षा-सुधार के लिए निम्न बातें उल्लेखनीय हैं-
- (i) सार्वजनिक परीक्षा केवल दो स्तरों अर्थात् कक्षा 10 और 12 के बाद होगी।
- (ii) परीक्षा प्रणाली को प्रभावशाली बनाने की दृष्टि से परीक्षा संचालन के कार्य का विकेन्द्रीकरण किया जायेगा।
- (iii) विकेन्द्रीकरण के लिए राज्य-शिक्षा-परिषदों को उपकेन्द्र खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा।
- (iv) विकेन्द्रीकरण की स्थिति में राज्य-परिषदों द्वारा प्रश्न-पत्र तैयार करना, छपवाना, परीक्षा फार्मों को एकीकृरत करना और रेण्डम आधार पर उक्त केन्द्रों की संचालन-व्यवस्था का निरीक्षण करना आदि जारी रहेगा।
- (v) परीक्षा की पुस्तिकाओं का केन्द्रीय मूल्यांकन जारी रहेगा।
(2) विश्वविद्यालय-स्तर पर सुधार – विश्वविद्यालय स्तर पर परीक्षा सुधार के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं-
- (i) शुरूआत में एकांक विश्वविद्यालयों, स्वीकृत विश्वविद्यालयों और स्वायत्त महाविद्यालयों में परास्नातक स्तर पर सतत् संस्थागत मूल्यांकन शुरू किया जायेगा।
- (ii) छात्रों की उपलब्धियों को अक्षर ग्रेड के द्वारा और सामूहिक उपलब्धियों को संचयी ग्रेड बिन्दु और औसत के द्वारा प्रदर्शित जायेगा।
- (iii) उपलब्धि में उन्नयन के लिए परीक्षा में दोबारा बैठने के प्राविधान इस प्रकार बनाये जायेंगे कि छात्रों का कोई अहित न होने पाये।
- (iv) जिन विश्वविद्यालयों में सम्बद्ध अनेक महाविद्यालय हैं वहाँ बाह्य परीक्षा जारी रखी जायेगी लेकिन प्रभावशाली विकेन्द्रीकरण के द्वारा परीक्षा-संचालन को सुधारा जायेगा।
- (v) विद्यालय-स्तरीय परीक्षा में सुधार की प्रक्रिया में बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों प्रवेश की स्वीकार्यता में सुधार करने का विचार किया जायेगा।
(3) परीक्षा-संचालन – कार्य-दल ने परीक्षा संचालन के सम्बन्ध में निम्न बातें कहीं-
- (i) परीक्षा से सम्बन्धित विभिन्न दुराचारों को परिभाषित करने और उन्हें गैर-जमानती स्वीकार करने के लिए विधेयक बनाने की सम्भावना पर विचार किया जायेगा।
- (ii) जब इस तरह के कानून बनाये जायेंगे तब विभिन्न अपराधों के लिए दण्ड की प्रकृति और प्रकार भी स्पष्ट किए जायेंगे।
- (iii) परीक्षा से सम्बन्धित कार्यों में लगे हुए व्यक्तियों को इसके अन्तर्गत लाया जायेगा।
- (iv) परीक्षा-संचालन में नवीन परिवर्तन एवं प्रयोग यथा परीक्षा में अनुचित साधनों एवं नकल को रोकने के लिए अनेक क्रमों में प्रश्नों को व्यवस्थित करके छुपाया जायेगा।
(ब) दीर्घकालीन परीक्षा सुधार
कार्य-दल ने दीर्घ-कालीन परीक्षा-सुधार के सम्बन्ध में भी व्यापक विचार व्यक्त किए। यहाँ इनका उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा है-
(1) विद्यालय स्तर – विद्यालय स्तरों पर परीक्षा-सुधार के सम्बन्ध में कार्य-दल ने निम्न सुझाव दिये-
- (i) कक्षा 5, 8, 10 और 12 की उपलब्धि के अपेक्षित स्तर को शिक्षा परिषदें निर्धारित करेंगी।
- (ii) उपलब्धि के इन स्तरों के अनुरूप अधिगम उद्देश्य भी स्पष्ट होंगे।
- (iii) ऐसी प्रणाली का विकास किया जायेगा जो औपचारिक परीक्षाओं के द्वारा मापे जाने वाले अधिगम पक्षों का मूल्यांकन कर सकें। जिन योग्यता को संस्थागत मूल्यांकनों द्वारा मापा जा सकता है, वे उसी के द्वारा मापी जायेंगी।
- (iv) मूल्यांकन प्रणाली विकसित करना एक सतत् प्रक्रिया है अतएव इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक बनाने के लिए शिक्षा-परिषदें एवं समिति बनाने का विचार करेंगी।
- (v) उपर्युक्त कार्य को सम्पन्न करने के लिए यह समिति कुछ विद्यालयों का चयन कर लेगी और उन विद्यालयों के छात्रों की परीक्षा का संचालन करेंगी एवं प्रमाण-पत्र देंगी।
- (vi) बाह्य परीक्षा के साथ ही शिक्षा के विद्यालय और गैर-विद्यालय पक्षों के सतत् संस्थागत मूल्यांकन को प्रारम्भ किया जायेगा।
- (vii) छात्रों के मूल्यांकन हेतु संचयी ग्रेड प्रणाली अपनायी जायेगी।
(2) विश्वविद्यालय स्तर – विश्वविद्यालय स्तर पर परीक्षा-सुधार के सम्बन्ध में निम्न सुझाव दिए-
- (i) सम्बद्ध महाविद्यालय के लिए बाह्य परीक्षा के स्थान पर किसी अन्य वैकल्पिक मूल्यांकन प्रणाली के विकास की सम्भावना पर विचार किया जायेगा।
- (ii) कुछ विश्वविद्यालयों के लिए केवल परीक्षा संस्था के रूप में कार्य करने के सम्बन्ध में विचार किया जायेगा।
- (iii) नीति के अन्दर शैक्षिक सुधारों के साथ ही मूल्यांकन विधियों में सुधार लाने के हेतु एक विस्तृत योजना बनायी जायेगी।
- (iv) मूल्यांकन के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को सतत् बनाने के लिए’भारतीय विश्वविद्यालय संघ’ के अंग के रूप में अथवा स्वतन्त्र रूप से किसी संस्था का निर्माण किया जायेगा।
(3) सामान्य – कार्य-दल ने परीक्षा से सम्बन्धित कुछ सुझाव भी दिए। जिनका उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है-
- (i) परीक्षाओं की विश्वसनीयता को बनाये रखने के लिए इसे मुक्त बनाया जायेगा। छात्रों को अपनी उत्तर-पुस्तिकाओं के पुनर्निरीक्षण करवाने और अन्य छात्रों की उत्तर-पुस्तिकाओं से तुलना करने का अधिकार होगा।
- (ii) परीक्षा के विभिन्न भागों को आंशिक रूप से उत्तीर्ण करने का प्राविधान किया जायेगा।
- (iii) छात्रों को अपने परीक्षा परिणाम को उन्नत करने का अवसर दिया जायेगा। परीक्षा-फल को ग्रेड के रूप में घोषित किया जाना चाहिए।
- (iv) ग्रेड क्रास करने के लिए विभिन्न विषयों के अंकों की स्केलिंग की जा सकती है।
- (v) प्रश्न-पत्र के निर्माताओं की सहायता के लिए प्रश्न-बैंक बनाये जाने चाहिए।
- (vi) प्रश्न निर्माताओं के लिए गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाने चाहिए।
- (vii) नवीन प्रवर्तन, यथा-सपुस्तक परीक्षा, निदेशात्मक मूल्यांकन आदि प्रयोगात्मक स्तर पर प्रारम्भ किए जाने चाहिए।
- (viii) पढ़ाने वाले ही मूल्यांकन करें इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए।
- (ix) संस्थागत मूल्यांकन एवं बाह्य परीक्षा के लिए अलग-अलग प्रमाण-पत्र दिए जाने चाहिए।
- (x) अध्यापकों के प्रशिक्षण और पुनर्बोधन कार्यक्रमों में नवीन मूल्यांकन प्रविधियों, प्रश्न-पत्र तैयार करने एवं योग्यता को मापने आदि पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय परीक्षण सेवा – राष्ट्रीय परीक्षण सेवा को इस तरह के गुण नियन्त्रक साधन के रूप में विकसित किया जायेगा कि स्वैच्छिक आधार पर राष्ट्रव्यापी परीक्षण आयोजित कर सकें जिससे कि योग्यता की तुलनीयता और स्वतन्त्र रूप से परीक्षण करने हेतु मानक तैयार किए जा सकें।


