B.Ed. Sem 4- Unit 2 notes
भाषा नीति (Language Policy)
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इसकी प्रमुख विशेषताएँ नीचे दी जा रही हैं- राजभाषा के सम्बन्ध में सांवैधानिक व्यवस्थाएँ अधिनियम की धारा 3 के अनुसार-
(क) संघ के उन सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए, जिनके लिए 26 जनवरी, 1965 से तत्काल पूर्व अंग्रेजी का प्रयोग किया जा रहा था, और
(ख) संसद में कार्य निष्पादन के लिए 26 जनवरी, 1965 के बाद भी हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकेगा। केन्द्र सरकार और हिन्दी को राजभाषा के रूप में न अपनाने वाले किसी राज्य के बीच पत्राचार अंग्रेजी में होगा, बशर्ते उस राज्य ने इसके लिए हिन्दी का प्रयोग करना स्वीकार न किया हो। उसी प्रकार, हिन्दी भाषी राज्यों की सरकारें ऐसे राज्यों की सरकारों के साथ अंग्रेजी में पत्राचार करेंगी और यदि वे ऐसे राज्यों को कोई पत्र हिन्दी में भेजती हैं तो साथ-साथ उसका अंग्रेजी अनुवाद भी भेजेंगी। पारस्परिक समझौते से यदि कोई भी दो राज्य आपसी पत्राचार में हिन्दी का प्रयोग करें तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों आदि के बीच पत्र व्यवहार के लिए हिन्दी अथवा अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन जब तक सम्बन्धित कार्यालयों आदि के कर्मचारी हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त न कर लें, तब तक पत्रादि का दूसरी भाषा में अनुवाद उपलब्ध कराया जाता रहेगा।
राजकाज अधिनियम की धारा 3 (3) के अनुसार निम्नलिखित कागज पत्रों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग अनिवार्य है- संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाएँ, प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्ट, प्रेस विज्ञप्तियाँ, संसद के किसी सदन या सदनों के समक्ष रखी जाने वाली प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्ट एवं सरकारी कागज-पत्र, संविदाएँ, करार, सुनज्ञप्तियाँ, अनुज्ञापन, टेंडर नोटिस और टेंडर फार्म।
धारा 3 (4) के अनुसार अधिनियम के अधीन नियम बनाते समय यह सुनिश्चित कर लेना होगा कि यदि केन्द्रीय सरकार का कोई कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में से किसी एक ही भाषा में प्रवीण हो, तो अपना सरकारी कामकाज उसी भाषा में कर सकता है और केवल इस आधार पर कि वह दोनों भाषाओं में प्रवीण नहीं है उसका कोई अहित नहीं होना चाहिए।
राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 द्वारा अधिनियम की धारा 3 (5) के रूप में यह उपबंध किया गया है कि उपर्युक्त विभिन्न कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने सम्बन्धी व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दी को राजभाषा के रूप में न अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमण्डल अंग्रेजी का प्रयोग खत्म करने के लिए आवश्यक संकल्प पारित न करें और इन संकल्पों पर विचार करने के बाद संसद का प्रत्येक सदन भी इसी आशय का संकल्प पारित न कर दे।
अधिनियम की धारा 7 के अनुसार किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, उस राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा दिए अथवा पारित किसी निर्णय, डिक्री अथवा आदेश के लिए, अंग्रेजी भाषा के अलावा, हिन्दी अथवा राज्य की राजभाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकता है। तथापि यदि कोई निर्णय, डिक्री या आदेश अंग्रेजी से भिन्न किसी भाषा में दिया या पारित किया जाता है तो उसके साथ-साथ सम्बन्धित उच्च न्यायालय के प्राधिकार से अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी किया जायेगा। अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार के राज्यपालों ने अपने उच्च न्यायालयों में उपर्युक्त उद्देश्यों के लिए राष्ट्रपति से हिन्दी के प्रयोग की अनुमति ली है।


