B.Ed. sem 4-भाषा नीति (Language Policy) क्या है?

B.Ed. Sem 4- Unit 2 notes

B. Ed. के द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम के चतुर्थ सेमेस्टर के विषय समकालीन भारत एवं शिक्षा (Contemporary India and Education) के सभी Unit के कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों का वर्णन यहाँ किया गया है। 
B.Ed. sem 4-भाषा नीति (Language Policy) क्या है?

भाषा नीति (Language Policy)

किसी भी प्रजातांत्रिक देश में राजकाज की भाषा उसकी जनता की भाषा होती है। इस विशाल भारत में 1652 भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें से 15 भाषाओं को संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दी गई है। संघ सरकार के राजकाज के कार्य तथा केन्द्र एवं राज्यों के बीच सम्पर्क भाषा की भूमिका निभाने का उत्तरदायित्व हिन्दी को ही सौंपा गया, क्योंकि इसे भारत देश के अधिकांश लोग बोलते और समझते हैं तथा यह भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परम्पराओं से जुड़ी हुई है।
 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी में लिखित हिन्दी संघ की राजभाषा है, लेकिन 343 (2) के अन्तर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात् सन 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की तरह अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।
 
उपर्युक्त 15 वर्षों की अवधि में भी, अर्थात् 1965 के पहले भी राष्ट्रपति आदेश द्वारा किसी काम के लिए अंग्रेजी के अलावा हिन्दी के प्रयोग की अनुमति दे सकते थे। अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारम्भ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ-साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खण्ड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई।
 
1950 में हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किए जाने पर यह अनुभव किया गया कि हिन्दी के माध्यम से प्रकाशन का कार्य चलाने के लिए कुछ प्रारम्भिक तैयारियों की आवश्यकता पड़ेगी; जैसे प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी एवं विधि-शब्दावली का निर्माण, प्रशासनिक एवं विधि-साहित्य का हिन्दी में अनुवाद, अहिन्दी भाषी सरकारी कर्मचारियों का हिन्दी प्रशिक्षण और हिन्दी टाइपराइटरों एवं अन्य साधनों की व्यवस्था आदि।
 
शब्दावली निर्माण के लिए शिक्षा मंत्रालय ने 1950 में वैज्ञानिक तथा तकनीकी बोर्ड की स्थापना की। इसके मार्गदर्शन में शिक्षा मंत्रालय के हिन्दी विभाग ने तकनीकी शब्दावली के निर्माण का कार्य चालू किया। बाद में हिन्दी विभाग का विस्तार होते होते सन् 1960 में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना हुई। इसके कुछ समय बाद 1961 में राष्ट्रपति के आदेशानुसार वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की भी स्थापना की गई। निदेशालय तथा आयोग ने अब तक विज्ञान, मानविकी, आयुर्विज्ञान, इंजीनियरी, कृषि तथा प्रशासन आदि के लगभग 4 लाख अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के हिन्दी पर्याय प्रकाशित कर दिए हैं। इसी प्रकार राजभाषा (विधायी आयोग) तथा राजभाषा खण्ड ने विधि शब्दावली का निर्माण कार्य लगभग पूरा कर लिया है।
संविधान की धारा 344 के अनुसार 1955 में एक राजभाषा आयोग बनाया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 1956 में प्रस्तुत की। उसकी सिफारिशों पर विचार करने के लिए 1957 में एक संसदीय समिति बनाई गई थी। इन दोनों की राय यह थी कि 1965 के बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग चलते रहना चाहिए तदनुसार 1963 में राजभाषा अधिनियम बनाया गया, जिसका 1967 में संशोधन किया गया।

इसकी प्रमुख विशेषताएँ नीचे दी जा रही हैं- राजभाषा के सम्बन्ध में सांवैधानिक व्यवस्थाएँ अधिनियम की धारा 3 के अनुसार-

(क) संघ के उन सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए, जिनके लिए 26 जनवरी, 1965 से तत्काल पूर्व अंग्रेजी का प्रयोग किया जा रहा था, और

(ख) संसद में कार्य निष्पादन के लिए 26 जनवरी, 1965 के बाद भी हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकेगा। केन्द्र सरकार और हिन्दी को राजभाषा के रूप में न अपनाने वाले किसी राज्य के बीच पत्राचार अंग्रेजी में होगा, बशर्ते उस राज्य ने इसके लिए हिन्दी का प्रयोग करना स्वीकार न किया हो। उसी प्रकार, हिन्दी भाषी राज्यों की सरकारें ऐसे राज्यों की सरकारों के साथ अंग्रेजी में पत्राचार करेंगी और यदि वे ऐसे राज्यों को कोई पत्र हिन्दी में भेजती हैं तो साथ-साथ उसका अंग्रेजी अनुवाद भी भेजेंगी। पारस्परिक समझौते से यदि कोई भी दो राज्य आपसी पत्राचार में हिन्दी का प्रयोग करें तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी। केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों आदि के बीच पत्र व्यवहार के लिए हिन्दी अथवा अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन जब तक सम्बन्धित कार्यालयों आदि के कर्मचारी हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त न कर लें, तब तक पत्रादि का दूसरी भाषा में अनुवाद उपलब्ध कराया जाता रहेगा।

राजकाज अधिनियम की धारा 3 (3) के अनुसार निम्नलिखित कागज पत्रों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग अनिवार्य है- संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाएँ, प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्ट, प्रेस विज्ञप्तियाँ, संसद के किसी सदन या सदनों के समक्ष रखी जाने वाली प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्ट एवं सरकारी कागज-पत्र, संविदाएँ, करार, सुनज्ञप्तियाँ, अनुज्ञापन, टेंडर नोटिस और टेंडर फार्म।

धारा 3 (4) के अनुसार अधिनियम के अधीन नियम बनाते समय यह सुनिश्चित कर लेना होगा कि यदि केन्द्रीय सरकार का कोई कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में से किसी एक ही भाषा में प्रवीण हो, तो अपना सरकारी कामकाज उसी भाषा में कर सकता है और केवल इस आधार पर कि वह दोनों भाषाओं में प्रवीण नहीं है उसका कोई अहित नहीं होना चाहिए।

राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 द्वारा अधिनियम की धारा 3 (5) के रूप में यह उपबंध किया गया है कि उपर्युक्त विभिन्न कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने सम्बन्धी व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दी को राजभाषा के रूप में न अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमण्डल अंग्रेजी का प्रयोग खत्म करने के लिए आवश्यक संकल्प पारित न करें और इन संकल्पों पर विचार करने के बाद संसद का प्रत्येक सदन भी इसी आशय का संकल्प पारित न कर दे।

अधिनियम की धारा 7 के अनुसार किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, उस राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा दिए अथवा पारित किसी निर्णय, डिक्री अथवा आदेश के लिए, अंग्रेजी भाषा के अलावा, हिन्दी अथवा राज्य की राजभाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकता है। तथापि यदि कोई निर्णय, डिक्री या आदेश अंग्रेजी से भिन्न किसी भाषा में दिया या पारित किया जाता है तो उसके साथ-साथ सम्बन्धित उच्च न्यायालय के प्राधिकार से अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी किया जायेगा। अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार के राज्यपालों ने अपने उच्च न्यायालयों में उपर्युक्त उद्देश्यों के लिए राष्ट्रपति से हिन्दी के प्रयोग की अनुमति ली है।

 

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