B.Ed. Sem 4- Unit 3 notes
मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) क्या है?
“मूल अधिकारों के सिद्धांत में शासन का सीमित होना छिपा होता है। सरकार और विधानमण्डल को तानाशाही से रोकना ही उसका उद्देश्य है और इस उद्देश्य को पाने के लिए यह व्यक्ति को विकास का मौका देता है चाहे किसी भी दल का व्यक्ति क्यों न हो, उसके मौलिक अधिकारों को हनन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के हनन का प्रयास किया जाता है, तो वह न्यायालय में जाकर तुरन्त अधिकारों की रक्षा कर लेता है।
विभिन्न मौलिक अधिकार (Various Fundamental Rights)
(1) समानता का अधिकार – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 18 में समानता के अधिकार की चर्चा है।
“भारत के राज्य क्षेत्र में राज्य किसी भी नागरिक को कानून के समक्ष समानता अथवा कानून के सामने-संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”
“राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, जाति, र्लिंग, जन्म-स्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।”
“राज्याधीन नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में सब नागरिकों के अवसर की समानता होगी।”
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(2) स्वतन्त्रता का अधिकार – स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन अनुच्छेद 19 से 22 तक में किया गया है। इन अनुच्छेदों में अनुच्छेद 19 सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस अनुच्छेद के अनुसार नागरिकों को भाषण और विचार-प्रकाशन की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता, संस्था परिषद या संघ-निर्माण की स्वतंत्रता, भारतीय राज्य-क्षेत्र में भ्रमण की स्वतंत्रता, व्यवसाय वृत्ति विकास या कारोबार की प्राप्ति की स्वतंत्रता है।
अनुच्छेद 21 द्वारा जीवन स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान किया गया है। इसमें लिखा है,
“किसी व्यक्ति को अपने प्राण अथवा दैनिक स्वाधीनता की विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य प्रकार से वंचित न किया जायेगा।”
अनुच्छेद 22 बन्दीकरण और नजरबंदी से बचाव के सम्बन्ध में है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को बहुत अधिक स्वतंत्रता प्रदान की परन्तु इस स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में नागरिकों को जहाँ स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है वहीं दूसरी ओर उन पर कुछ प्रतिबन्ध भी लगाये गये हैं जिससे कि उनकी स्वतंत्रता निरंकुशता का रूप धारण न कर ले।
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार – संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 में नागरिकों को शोषण से मुक्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 23 के द्वारा बेगार को निषिद्ध ठहराया गया है। अनुच्छेद 24 के द्वारा बाल श्रम का निषेध किया गया है। समाज के शोषण की प्रवृत्ति अत्यन्त प्राचीनकाल से चली आ रही है। भारतीय संविधान में शोषण के विरुद्ध जिन अधिकारों का प्राविधान किया गया है उनका मूल उद्देश्य यही है कि बेगार और बलात् श्रम का अन्त हो। मानव व्यापार समाप्त हो और कम आयु के बालक-बालिकाओं से मजदूरी न करवायी जाये। यदि कोई व्यक्ति दूसरों से बेगार लेता है तो दण्डित किया जा सकता है। पुरुषों-स्त्रियों और बालक-बालिकाओं का क्रय-विक्रय अवैध है। 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने या खान में नहीं रखा जा सकता है और न ही किसी दूसरे संकटयुक्त कार्य में लगाया जा सकता है। वास्तव में शोषण के विरुद्ध अधिकार भारतीय संविधान का एक प्रगतिशील तत्व है।
(4) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार – संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की चर्चा की गयी है। अनुच्छेद 25 अन्तःकरण की तथा धर्म के अबाध मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
अनुच्छेद 27 धार्मिक मामलों में दिये गये धन से कर की अदायगी को अलग रखने की व्यवस्था करता है। इसमें लिखा है,
“कोई भी व्यक्ति ऐसे करों को देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा जिनके आगम किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से विनियुक्त कर दिये गये हों।”
अनुच्छेद 28 के द्वारा विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा की स्वतंत्रता दी गयी है। भारतीय संविधान धर्म-निरपेक्ष संविधान है। संविधान द्वारा भारत के विभिन्न धर्मानुयायी, बिना किसी दूसरे धर्म के अनुयायियों के कार्यों में हस्तक्षेप किये हुए अपने-अपने धर्म का पालन कर सकते है।
(5) सांस्कृतिक और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार– भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 व 30 में सांस्कृतिक एवं शिक्षा-सम्बन्धी अधिकारों का उल्लेख किया गया है। संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और शिक्षा उसकी चेतना शक्ति है। जिस राष्ट्र में शिक्षा और संस्कृति की स्वतंत्रता नहीं प्रदान की जाती है वह राष्ट्र कभी उन्नति नहीं कर सकता है। भारतीय संविधान में भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाती है। प्रत्येक वर्ग को इस प्रकार के शिक्षालयों की स्थापना करने का अधिकार है जिससे उसकी भाषा, लिपि और धर्म की तथा संस्कृति की उन्नति हो। सरकारी शिक्षा संस्थाओं में स्थान होने पर सभी को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार है। सरकार की ओर से बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा संस्थाओं को अनुदान दिया जाता है। भारतीय संविधान में यह स्पष्ट लिखा है कि देश के किसी भाग में यदि कोई वर्ग ऐसा है जिसकी अपनी भाषा है, अपनी लिपि है, अपनी संस्कृति है तो उनको मिटाने का प्रयास नहीं किया जायेगा और उसे उनकी रक्षा करने का पूर्ण अधिकार होगा।
(6) सम्पत्ति का अधिकार– जीवन में सम्पत्ति का अत्यन्त महत्त्व है। संपत्ति के बिना मनुष्य का काम नहीं चल सकता।
प्रसिद्ध दार्शनिक जॉन लॉक ने लिखा था-
“प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता तथा सम्पत्ति का प्राकृतिक अधिकार है।”
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 में सम्पत्ति के अधिकार का उल्लेख था। 1978 ई0 में किये गये संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान की धारा E/219 (च) को हटा दिया गया।
संविधान के भाग 3 की धारा 31 (1) को हटाकर उसके स्थान पर नई धारा जोड़ दी गयी जो इस प्रकार है,
“किसी भी व्यक्ति को किसी कानूनी शक्ति के अतिरिक्त उसकी सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।”
इस प्रकार अब सम्पत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं रहा है वरन् एक कानूनी अधिकार है। हाँ, यह अवश्य है कि सम्पत्ति का अधिकार के रूप में न रहने पर भी कानूनी प्रक्रिया के बिना शासन द्वारा किसी व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं छीनी जा सकेगी।
(7) संवैधानिक उपचारों का अधिकार – संविधान में मौलिक अधिकारों के उल्लेख से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात है उन्हें क्रियान्वित किये जाने की क्योंकि इस व्यवस्था के बिना मौलिक अधिकार अर्थहीन सिद्ध होंगे। संविधान-निर्माताओं द्वारा इस उद्देश्य से संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी संविधान में स्थान दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किये जाने पर न्यायालय की शरण ले सकते हैं। संविधान की धारा 32 में इस बात का प्राविधान है कि यदि किसी के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वह सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय बन्दी प्रत्यक्षीकरण परमादेश, प्रतिबन्ध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृक्षा द्वारा नागरिक के अधिकारों की रक्षा कर सकता है। न्यायालय को व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित उन सभी कानूनों को अवैधानिक घोषित करने का अधिकार है जो मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।
डॉ० अम्बेडकर ने कहा था,
“यदि कोई मुझसे यह पूछे कि संविधान का वह कौन-सा अनुच्छेद है जिसके बिना संविधान शून्यप्राय हो जायेगा, तो इस अनुच्छेद (अनुच्छेद-32) को छोड़कर मैं और किसी अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता। यह तो संविधान का हृदय और आत्मा है।”
भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर ने इसे “भारतीय संविधान का सबसे प्रमुख लक्षण और संविधान सभा द्वारा स्थापित ‘लोकतान्त्रिक भवन’ की आधारशिला कहा है।”
मौलिक अधिकारों का निलम्बन –
भारतीय संविधान में नागरिकों को जो मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं उनके निलम्बन की भी व्यवस्था है। जब वाह्य आक्रमण या आन्तरिक अशान्ति के फलस्वरूप राष्ट्रपति द्वारा आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी जाती है तो राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19 में दिये गये स्वतंत्रता के सभी अधिकार निलम्बित कर दिये गये हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति मौलिक अधिकारों की प्राप्ति अथवा रक्षा के लिए न्यायालय में प्रार्थना के अधिकार को भी स्थगित कर सकता है। राष्ट्रपति इस प्रकार के आदेश सम्पूर्ण भारत अथवा उसके किसी भाग के लिए जारी कर सकता है। राष्ट्रपति को मौलिक अधिकारों के निलम्बन के सम्बन्ध में आदेश संसद द्वारा उनकी पुष्टि होना आवश्यक हो जाता है। आपातकालीन स्थिति की समाप्ति पर नागरिकों को ये मौलिक अधिकार पुनः प्राप्त हो जाते हैं।
मौलिक अधिकारों का मूल्यांकन –
- भारतीय संविधान में दिये गये मौलिक अधिकार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं परन्तु कतिपय विद्वानों ने इनकी आलोचना भी की है।
- आलोचना के कई आधार हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अनेक ऐसी बातों को छोड़ दिया गया है जिन्हें मौलिक अधिकार घोषित किया जाना चाहिए था।
- भारतीय संविधान की इस सम्बन्ध में यह कहकर भी आलोचना की जाती है कि संविधान में उल्लिखित मौलिक अधिकारों के साथ इतने अधिक अपवाद और प्रतिवाद लगा दिये गये हैं कि यह समझना कठिन है कि व्यक्ति को मौलिक अधिकारों से क्या मिला? संविधान के द्वारा संकटकालीन परिस्थितियों में कार्यपालिका को मौलिक अधिकारों के स्थगन को जो अधिकार दिया गया है उसकी भी आलोचना की गयी है।
- श्री हरिविष्णु कामथ ने कहा था, “इस व्यवस्था द्वारा हम तानाशाही राज्य और पुलिस राज्य की स्थापना कर रहे हैं। परन्तु यदि किंचित् गहनता से अध्ययन एवं विचार किया जाय तो इन आलोचनाओं में कोई दम नहीं है।
- किसी भी देश में संविधान में सभी बातों का उल्लेख मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत नहीं किया जा सकता। जहाँ तक मौलिक अधिकारों पर लगाये गये अपवादों एवं प्रतिवादों का प्रश्न है उतनी स्वतंत्रता और अधिकार प्रदान करना न तो संभव है और न ही हितकर। इस सम्बन्ध में भूतपूर्व न्यायाधीश श्री छागला ने अपनी पुस्तक “विधि, स्वतंत्रता और जीवन” में लिखा है, “मेरे विचार से यह आलोचना उचित नहीं है। भारतीय संविधान के द्वारा असंख्य अपवादों और प्रतिबन्धों के माध्यम से मौलिक अधिकारों को सीमित तो कर दिया गया है परन्तु संविधान के द्वारा इस प्रकार के प्रतिबन्धों को औचित्य के निर्णय की शक्ति व्यवस्थापिका या कार्यपालिका को नहीं वरन् न्यायपालिका को सौंपी गयी है और न्यायपालिका स्वतंत्र होने के कारण नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका पर भरोसा कर सकते हैं।” यह कहना भी समीचीन नहीं है कि संकटकाल में मौलिक अधिकारों के स्थगन का जो अधिकार दिया गया है उससे पुलिस राज्य की स्थापना होती है।
- यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्र की सुरक्षा व्यक्ति की स्वतंत्रता से कहीं अधिक मूल्यवान है। संकटकालीन परिस्थितियाँ अल्पकालिक ही होती हैं और जब राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में हो तो अल्पकाल के लिए व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं रहता। इस व्यवस्था का समर्थन करते हुए संविधान सभा में कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा था, “यह व्यवस्था अत्यन्त ही आवश्यक है।
- यह व्यवस्था संविधान का जीवन होगी, इससे लोकतंत्र की हत्या नहीं बल्कि रक्षा होगी।” अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारतीय संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं तथा उनकी आलोचना करना समीचीन प्रतीत नहीं होता।


